।। तृतीय आवश्यक कर्म:स्वाध्याय ।।

दृष्टांत

एक दिन बुद्धिकुमार के मन में बैठे-2 विचार आया कि कल कुछ कामकाज विशेष नहीं है, न हो तो ससुराल ही हो आयें, वहां कुछ लाभ होगा और माल भी खाने को मिलेगा। घर पत्नी से कहके चल दिया बुद्धिकुमार और जा पहुंचा कुछ ही समय के अंदर ससुराल में। सासू ने जमाई को देखा तो बाहृ में दिखावटी खुशी मनाने लगी और अंतर्मन में करने लगी विचार कि आज कोई ऐसी चाल चली जाये, जिससे जमाई के लिए खीर, पूडी न बनानी पड़े। भैंस का दूध भी खर्च न हो और घी भी। लोभ सासू जमाई के पास आकर पूछने लगी अपनी बेटी के समाचार और कहने लगी - कंुवर साहब आज कमजोर कैसे हो गये? क्या पेट आदि में तकलीफ है? चेहरे पर कुछ उदासी भी छाई है। आप कोई बात की चिंता मन करो मैं आपके लिए हल्का भोजन बनाऊंगी । सासू जी ने कुछ ही समय में खिचडी बनाके जमाई को बिठा दिया जीमने और आप ढोलने लगी पंखे से हवा। जमाई ने मन में विचार किया कि माल खाने के लिए तो ाअये ससुराल, यहां पर खिचड़ी मिली, इस में भी घी नहीं। सासू जीने कहा - कुंवर जी आप धीरे-धीरे क्यों जीम रहे हो? क्या खिचड़ी मर्ग है? बुद्धिकुमार ने कहा कि नहीं, माता जी! हमारी माता जी जब कभी खिचड़ी बनाती हैं तो उसमें घी भी डालती हैं। सासू ने उसी समय पास में रखी हुई घी की कुलड़ी को थाली में औंधा कर दिया,परंतु घी की बूंद भी न निकली, क्याोंकि घी जमा हुआ था। जमाई की बुद्धि तेज थी, जैसा नाम था वैसा ही काम। पास में रखे हुए पानी के लोटे को फैला के सासुजी से पानी का इशारा कर दिया। सासूजी पानी लने गयी इधर उसने घी को जलती हुई आग के ऊपर रख कर गर्म कर लिया। सासू के आते ही कुछ धीरे-धीरे जीमना शुरू कर दिया तो वह कहने लगी कि घी और दूं क्या? जमाई ने भी इशारा कर दिया। इस बार उसने जैसे ही कुलडी औंधाई उसी समय सारा का सारा घी थाली में आ गिरा। सासू के मन में बड़ा धक्का लगा कि अब क्या करनाचाहिए। बुढित्रया जामई से कहने लगी कि हमारे यहां की रीति है कि सासू जमाई के साथ बैठकर जीमती है, उसने कहा कोई बात नहीं, बैठ जाइये। बुढि़या ने यह कहते हुए कि लाला जी आपकी मां हमारी बेटी को गाली निकालती हैं, लडती है, आप अपनी माता जी को समझाते नहीं। ऐसा कहते हुए सभी घी अपनी ओर कर बुढि़या ने कहा कि आधी थाली में आप जीमों, आधी में मैं। बुद्धिकुमार ने यह कहते हुए कि आपकी बेटी को घर की बात बाहर नहीं कहनी चाहिए, घर की घर में ही इस तरह जी जाना चाहिए - थाली उठाई और सब घी को पी लिया। सासू झांकती रही गयी।

इसी प्रकार चारों अनुयोगों के मन्थन से जो भगवान की वाणीरूपी अमृत प्राप्त हो उसे इसी प्रकार पी जाना चाहिए, चाहे सामने जिनी भी जटिल समस्यायें क्यों न हों? इन चारों का मनन किये बिना, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यकृचारित्र और तपइ न चार आराधनाओं की प्राप्ति नहीं हो सकती, चार आराधनाओं के बिना आत्मशुद्धि नहीं हो सकती, आत्म-शुद्धि के बिना पूर्ण ज्ञान (केवलज्ञान) नहीं हो सकता, केवल ज्ञान के बिना अक्षय आनन्द आर्थात मोक्षपद की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसलिए इस गम्भीर, मधुर, अमृत तुल्य, आनन्ददायक अनेकान्तमय जिनवाणी का स्वध्याय, मनन, सदैव करते रहना ही समस्त धर्म का मूल है, परम तपह ै, परम आनन्द है, रम ब्रह्म की प्राप्ति है।

jain temple27
विज्ञान

इसके अतिरक्त इस गम्भीर वाणी में भौतिक विज्ञान के द्वारा आविष्कृत सभी अविष्करों की प्रतिक्रयाओं का निरूपण है। जो कालदोष से विलुप्त हो गये हैं परंतु उनके नाम आदि अवश्यक उपलब्ध हो जाते हैं। जैसे आग्नेय अस्त्र, धूम्रबाण, वरूणबाण, विमान, जलगमन, आकाश व अग्निगमन आदि ये ही, आज के बम, अश्रुगैस, हैलीकाॅप्टर, स्टीमर आदि है। महात्मओं ने जिस गणित का वर्णन किया है आज के विज्ञानवेत्ता अभी उसका स्पर्श भी नहीं कर पाये। न करने की सामथ्र्य है क्योंकि इनका ज्ञान सीमित रूप में है, मात्र रूपी पदार्थ को हीदेख सकते हैं। उन महाऋषियों का ज्ञान क्षेत्र मात्र यह लोक ही नहीं, अपितु परलोक भी था। वह बात बिल्कुल सत्य मानी जाती थी जिसे भारतीय ऋषि कह देते थे। आज यह बात सत्य मानी जाती है जिसे वैज्ञानिक कहता है। यह मालूम नहीं है। भोली दुनिया को कि आज जो कुछ चमत्कार दिखाई दे रहा है, यह सब उन ऋषियों के द्वारा रचे हुए ग्रन्थों का ही है, जिन ग्रन्थों को न कुछ मूल्य लेकर विदेश भेज दिया गया था या जो अनुपलब्ध हो गये थे। आज भी जैन सिद्धांत में पूर्ण विज्ञान भरा हुआ पड़ा है। पा जायेंगे अगर खोज करेंगे तो,े उसकी गहराई में जायेंगे तो।

स्वाध्याय एक का ही नहीं

सभी विषयों में ज्ञान के विकास के लिए उपरोक्त सभी ग्रन्थ पठनीय हैं। परंतु आत्म-कल्याण की दृष्टि रखने वाले का द्रव्यानुयोग व अध्यात्म के ग्रन्थ पढ़कर तत्व विवेक जागृत करना मुख्य कर्तव्य है, तथा पापरूप कर्म से बचने के अर्थ और सदाचार को जीवन में उतारने के अर्थ आचार शास्त्रों का पठन भी अनिवार्य है। अन्यथा तो तत्व-विवेक केवल शब्दों का भाव व शुष्क चर्चा रूप मात्र बनकर रह जायेगा। तत्व विवेक से शून्य आचारण बाहृ क्रियाकाण्ड-आडम्बर बनकर रह जावेगा। अतः दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इसलिए मुक्तिपथ की और चलने वाले प्रत्येक मानव को सभी सद्शास्त्रों का स्वाध्याय करना चाहिए। जीवन में और कुछ करें, न करें, स्वाध्याय अवश्य करें।

स्वाध्याय निश दिन करें, लाख काम को छोड़।
अनुभव निजका होयगा, करम जायं मुख मोड़।।66।।
जहां चन्दन ही दाहक हो तो,
और औषधियां क्या करेंगी।।
साधना में अगर राग नजर आए,
तो मुक्ति बनिता क्या वरेगी।।
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