उत्तमसंयम
‘‘संयमनं संयमः। अथवा व्रतसमितिकषायदण्डेन्द्रियाणां धारणानुपालननिग्रहत्यागजयाः संयमः।

संयमन को संयम कहते हैं। संयमन अर्थात् उपयोग को परपदार्थ से समेट कर आत्मसन्मुख करना, अपने में सीमित करना, अपने में लगाना। उपयोग की स्वसन्मुखता, स्वलीनता ही निश्चयसंयम है। अथवा पाँच व्रतों का धारण करना, पाँच समितियों का पालन करना, क्रोधादि कषायों का निग्रह करना, मन-वचन-कायरूप तीन दण्डों का त्याग करना और पाँच इन्द्रियों के विषयों को जीतना संयम है।‘

संयम के साथ लगा ‘उत्तम‘ शब्द सम्यग्दर्शन की सत्ता का सूचक है। जिसप्रकार बीज के बिना वृक्ष की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फलागम संभव नहीं है; उसीप्रकार सम्यग्दर्शन के बिना संयम की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि एवं फलागम संभव नहीं है।

इस सन्दर्भ में महान दिग्गज आचार्य वीरसेन स्वामी लिखते हैं -

‘‘सो संजमो जो सम्माविणाभावी ण अण्णो।

संयम वही है, जो सम्यक्त्व का अविनाभावी हो, अन्य नहीं।

इसी बात को धवला, प्रथम पुस्तक में इसप्रकार प्रश्नोत्तर के रूप में दिया गया है -

‘‘प्रश्न - कितने ही मिथ्यादृष्टि संयत (संयमी) देखे जाते हैं?

उत्तर - नहीं; क्योंकि सम्यग्दर्शन के बिना संयम की उत्पत्ति ही नहीं हो सकती।

संयम मुक्ति का साक्षात् कारण है। दुःखों से छूटने का एकमात्र उपाय सम्यग्दर्शन संयम अर्थात् उत्तमसंयम ही है। बिना संयम धारण किये तीर्थंकरों को भी मोक्ष प्राप्त नहीं होता। कहा भी है -

जिस बिना नहीं जिनराज सीझे, तू रुल्यो जग कीच में।
इक घरी मत विसरो करो नित, आयु जम मुख बीच में।।

निरंतर मौत की आशंका से घिरे मानव को कवि प्रेरणा दे रहे हैं कि संयम को एक घड़ी के लिये भी मत भूलो (संयम विणु घडि़ एक्कु न जाइ), क्योंकि यह सारा जगत संयम के बिना ही इस संसार की कीचड़ में फँसा हुआ है। संसार-सागर से पार उतारने वाला एकमात्र संयम ही है।

संयम एक बहुमूल्य रत्न है। इसे लूटने के लिए पंचेन्द्रिय के विषय-कषायरूपी चोर निरंतर चारों ओर चक्कर लगा रहे हैं।

अतः कवि सचेत करते हुए कहते हैं -

संयम रतन संभाल, विषय चोर चहुँ फिरत हैं।

आगे कहते हैं-

उत्तम संजम गहु मन मेरे, भव-भव के भाजैं अघ तेरे।
सुरग नरक पशु गति में नाहीं, आलस हरन करन सुख ठाहीं।।

यहाँ अपने मन को समझाते हुए कहा गया है कि हे मन! उत्तमसंयम को धारण कर; इससे तेरे भव-भव के बंधे पाप भाग जावेंगे, कट जावेंगे। यह संयम स्वर्गों और नरकों में तो है ही नहीं, अपितु पूर्ण संयम तो तिर्यंच गति में भी नहीं है। एकमात्र मनुष्य भव ही ऐसा है, जिसमें संयम धारण किया जा सकता है।

मनुष्य जन्म की सार्थकता संयम धारण करने में ही है। कहते हैं देव भी इस संयम के लिए तरसते हैं। जिस संयम के लिए देवता भी तरसते हों और जिस बिना तीर्थंकर भी न तिरें, वह संयम कैसा होगा? इस पर हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए। उसे मात्र दो-चार दिन भूखे रहने एवं सिर मुंडन करा लेने मात्र तक सीमित नहीं किया जा सकता।

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संयम दो प्रकार का होता है - (१) प्राणीसंयम और (२) इन्द्रियसंयम

छहकाय के जीवों के घात एवं घात के भावों के त्याग को प्राणीसंयम और पंचेन्द्रियों तथा मन के विषयों के त्याग को इन्द्रियसंयम कहते हैं।

षट्काय के जीवों की रक्षारूप अहिंसा एवं पंचेन्द्रियों के विषयों के त्यागरूप व्रतों की बात जब भी चलती है - हमारा ध्यान परजीवों के द्रव्यप्राणरूप घात एवं बाह्म भोगप्रवृत्ति के त्याग की ओर ही जाता है; अभिप्राय में जो वासना बनी रहती है, उसकी ओर ध्यान ही नहीं जाता।

इस संदर्भ में महापंडित टोडरमलजी लिखते हैं -

‘‘बाह्य त्रस-स्थावर की हिंसा तथा इन्द्रिय-मन के विषयों में प्रवृत्ति उसको अविरति जानता है; हिंसा में प्रमाद परिणति मूल है और विषयसेवन में अभिलाषा मूल है, उसका अवलोकन नहीं करता। तथा बाह्य क्रोधादि करना उसको कषाय जानता है, अभिप्राय मंे राग-द्वेष बस रहे हैं, उनको नहीं पहिचानता।

यदि बाह्य हिंसा का त्याग एवं इन्द्रियों के विषयों की प्रवृत्ति नहीं होने का ही नाम संयम है, तो फिर देवगति में भी संयम होना चाहिए; क्योंकि सोलह स्वर्गों के ऊपर तो उक्त बातों की प्रवृत्ति संयमी पुरुषों से भी कम पाई जाती है।

सर्वार्थसिद्धि के सम्यग्दृष्टि अहमिन्द्रों के पंचेन्द्रियों के विषयों की प्रवृत्ति बहुत कम या न के बराबर-सी पाई जाती है। स्पर्शनेन्द्रिय के विषय-सेवन (मैथुन) की प्रवृत्ति तो दूर, तेतीस सागर तक उनके मन में विषय-सेवन का विकल्प भी नहीं उठता।

सर्वमान्य जैनाचार्य उमास्वामी ने स्पष्ट लिखा है - ‘‘परेऽप्रवीचाराः सोलह स्वर्गों के ऊपर प्रवीचार का भाव भी नहीं होता।‘‘

रसना इन्द्रिय के विषय में भी उन्हें तेतीस हजार वर्ष तक कुछ भी खाने-पीने का भाव नहीं आता। तेतीस हजार वर्ष के बाद भी जब विकल्प उठता है तो गले से ही अमृत झर जाता है, जबान जूठी तब भी नहीं होती। इसीप्रकार घ्राण, चक्षु, कर्ण इन्द्रियों के विषयों का भी अभाव-सा ही पाया जाता है। उन्हें जिनेन्द्र पंचकल्याणक को देखने, दिव्यध्वनि सुनने तक का भाव नहीं आता।

षट्काय के जीवों की हिंसा का भी प्रसंग वहाँ नहीं है। कषाय भी सदा मंद, मंदतर और मंदतरम रहती है; क्योंकि उनके शुक्ल लेश्या होती है। पाँचों पापों की प्रवृत्ति भी नहीं देखी जाती। यह सब बातें जिनवाणी में यत्र-तत्र-सर्वत्र देखी जा सकती है। कुछ कम-बढ़ इसीप्रकार की स्थिति नवग्रैवेयक के मिथ्यादृष्टि अहमिन्द्रों के भी पाई जाती है।

जहाँ एक ओर अहमिन्द्रों के बाह्यरूप से षट्काय के जीवों की हिंसा, पंचेन्द्रिय के विषयों, कषायों और पाँचों पापों की प्रवृत्ति नहीं होने पर या हम से कम हाने पर भी शास्त्राकार लिखते हैं कि उनके संयम नहीं है, वे असंयमी हैं; वहीं दूसरी ओर अणुव्रती मनुष्य श्रावक को देशसंयमी ही सही, पर संयमी कहा गया है - जबकि उसके अहमिन्द्रों की अपेक्षा हिंसा, पंचेन्द्रिय के विषयों, कषायों एवं पापों में प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है।

यद्यपि अणुव्रती के त्रसहिंसा का त्याग होता है; तथापि उद्योगी, आरंभी एवं विरोधी त्रसहिंसा से भी वह नहीं बच पाता है। प्रयोजनभूत स्थावरहिंसा तो होती ही है।

पंचेन्द्रियों के विषयों की दृष्टि से विचार करें तो स्पर्शन इन्द्रिय के सन्दर्भ में यद्यपि वह परस्त्रीसेवन का सर्वथा त्यागी होता है, तथापि स्वस्त्रीसेवन तो उसके पाया ही जाता है; जबकि अहमिन्द्रों के स्त्री-सेवन का मन में भी विकल्प नहीं उठता।

इसीप्रकार रसनेन्द्रिय के विषय में विचार करें तो न सही अभक्ष्य भक्षण एवं खाने-पीने की लोलुपता; पर खाता-पीता तो है ही। भले ही शुद्ध खान-पान ही सही; पर स्वाद तो लेता ही होगा। अहमिन्द्रों के तो हजारों वर्ष तक भोजन ही नहीं, स्वाद की तो बात ही दूर है। घ्राण, चक्षु और कर्ण के विषय में भी यही स्थिति है। फिर भी अणुव्रती मनुष्य को संयमी कहा है।

यदि विषयों की बाह्य प्रवृत्ति के त्याग का नाम ही संयम होता तो फिर वह देवों में अवश्य होना चाहिए था और मनुष्य एवं तिर्यंचों में उसकी संभावना कम होनी चाहिए थी। किन्तु शास्त्रों के अनुसार संयम देवों में नहीं, मनुष्यों में है। इससे सिद्ध होता है कि संयम मात्र बाह्य प्रवृत्ति का नाम नहीं, बल्कि उस पवित्र आन्तरिक वृत्ति का नाम है, जो मानवों में पाई जा सकती है; देवों में नहीं, चाहे उनकी बाह्य वृत्ति कितनी ही ठीक क्यों न हो।

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वस्तुतः संयम सम्यग्दर्शनपूर्वक आत्मा के आश्रय से उत्पन्न हुई उस परम पवित्र वीतराग परिणति का नाम है, जो कि छठे-सातवें गुणस्थान में झूलने वाले या उससे आगे बढ़े हुए मुनिराजों के अनन्तानुबंधी, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण कषाय के अभाव में प्राप्त होती है; तथा जो पंचमगुणस्थानवर्ती मनुष्य और तिर्यंचों में भी अनंतानुबंधी व अप्रत्याख्यान कषाय के अभाव मंे पाई जाती है; तथा अनन्तानुबंधी आदि कषायों के सद्भाव में ग्रैवेयक तक के मिथ्यादृष्टि अहमिन्द्रों एवं अप्रत्याख्यानावरणदि कषायों के सद्भाव मंे सर्वार्थसिद्धि के अहमिन्द्रों में नहीं पाई जाती है।

सम्यग्दर्शनपूर्वक आत्मा के आश्रय से उत्पन्न हुई अनंतानुबंधी आदि तीन या दो कषायों के अभाव मे प्रकट वीतराग परिणतिरूप उत्तमसंयम जब अंतर में प्रकट होता है, तब उस जीव की बाह्य परिणति भी पंचेन्द्रियों के विषयों एवं हिंसादि पापों के सर्वदेश या एकदेश त्यागरूप नियम से होती है; उसे व्यवहार से उत्तमसंयमधर्म कहते हैं। अंतरंग में उक्त वीतराग परिणति के अभाव में चाहे जैसा बाह्य त्याग दिखाई दे; वह व्यवहार से भी उत्तमसंयमधर्म नहीं है।

अंतरंग से बहिरंग की व्याप्ति तो नियम से होती है, पर बहिरंग के साथ अंतरंग की व्याप्ति का कोई नियम नहीं है। तात्पर्य यह है कि जिसके अंतरंग अर्थात् निश्चय उत्तमसंयमधर्म प्रकट होता है, उसका बाह्य व्यवहार भी नियमरूप से तद्नुकूल होगा। किन्तु यदि बाह्य व्यवहार ठीक भी दिखाई दे तो भी कोई गारंटी नहीं कि उसका अंतरंग भी पवित्र होगा ही।में

उत्तमसंयमधर्म में छहकाय के जीवों की रक्षा एवं पंचेन्द्रिय और मन को वश में करने की बात कही गई है -

‘काय छहों प्रतिपाल, पंचेन्द्रिय मन वश करो।‘

किन्तु सामान्यजन इसका भी सही भाव नहीं समझ पाते।

छहकाय के जीवों की रक्षा में उनका ध्यान परजीवों की रक्षा की ओर ही जाता है।‘मैं स्वयं भी एक जीव हूँ‘ - इसका उन्हें ध्यान ही नहीं रहता। परजीवों की रक्षा का भाव करके सब जीवों ने पुण्यबंध तो अनेक बार किया; किन्तु परलक्ष्य से निरंतर अपने शुद्धोपयोगरूप भावप्राणों का जो घात हो रहा है, उसकी ओर इनका ध्यान ही नहीं जाता। मिथ्यात्व और कषायभावों से यह जीव निरंतर अपघात कर रहा है। इस महाहिंसा की इसे खबर ही नहीं है।

हिंसा की परिभाषा में ही ‘प्रमत्तयोगात् शब्द पड़ा है - जिसका तात्पर्य ही यह है कि प्रमाद अर्थात् कषाय के योग से अपने और पराये प्राणों का व्यपरोपण हिंसा है। इसे ही आचार्यकल्प पंडित टोडरमलजी ने ‘हिंसा में प्रमाद परिणति मूल है‘ कहा है। जबतक प्रमाद (कषाय) परिणति है, तबतक हिंसा अवश्य है, चाहे परप्राणों का घात हो या न भी हो। इस संदर्भ में विशेष जानने के लिए लेखक का ‘अहिंसा‘ सम्बंधी लेख देखना चाहिए। प्रकृत में विस्तृत विवेचन सम्भव नहीं है।

जब हम इन्द्रियसंयम के सम्बंध में विचार करते हैं तो देखते हैं कि सारा जगत इन्द्रियों का गुलाम हो रहा है। यद्यपि सभी आत्माएँ ज्ञानानन्दस्वभावी हैं; तथापि वर्तमान में हमारा ज्ञान भी इन्द्रियों की कैद में है और आनंद भी इन्द्रियाधीन हो रहा है। सुबह से शाम तक हमारे सारे कार्य इन्द्रियों के माध्यम से ही सम्पन्न होते हैं। यदि हम आनंद लेंगे तो इन्द्रियों के माध्यम से और कुछ जानेंगे तो भी इन्द्रियों के माध्यम से ही। यह है हमारी इन्द्रियाधीनता, पराधीनता। हमारा ज्ञान भी इन्द्रियाधीन और आनंद भी इन्द्रियाधीन।

ज्ञान और आनंद को इन्द्रियों की पराधीनता से मुक्त कराना बहुत जरूरी है। तदर्थ हमें इन्द्रियों को जीतना होगा, जितेन्द्रिय बनना होगा।

यहाँ एक प्रश्न संभव है कि इन्द्रियाँ क्या हमारी शत्रु हैं जो उन्हें जीतना है? जीता तो शत्रु को जाता है।

हाँ! हाँ! वे हमारी शत्रु हैं, क्योंकि उन्होंने हमारी ज्ञानानंद-निधि पर अनधिकार अधिकार कर रखा है।

आप यह भी कह सकते हैं - इन्द्रियाँ तो हमारे आनंद और ज्ञान में सहायक है। वे तो हमें पंचेन्द्रियों के भोगों के आनंद लेने में सहायता करती हैं, पदार्थों को जानने में भी सहायता करती हैं। सहायकों को शत्रु क्यों कहते हो? सहायक तो मित्र होते हैं, शत्रु नहीं।

पर आप यह क्यों भूल जाते हैं कि ज्ञान और आनंद तो आत्मा का स्वभाव है। स्वभाव में पर की अपेक्षा नहीं होती। अतीन्द्रिय-आनंद और अतीन्द्रिय-ज्ञान को किसी ‘पर‘ की सहायता की आवश्यकता नहीं है।

यद्यपि इन्द्रियसुख और इन्द्रियज्ञान में इन्द्रियाँ निमित्त होती हैं, तथापि इन्द्रियसुख सुख है ही नहीं। वह सुखाभास है, सुख-सा प्रतीत है; पर वस्तुतः सुख नहीं, दुःख ही है, पापबंध का कारण होने से आगामी दुःख का भी कारण है। इसीप्रकार इन्द्रियाँ रूप,रस,गंध,स्पर्श और शब्द की ग्राहक होने से मात्र जड़ को जानने में ही निमित्त हैं, आत्मा को जानने में वे साक्षात् निमित्त भी नहीं है।

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विषयों में उलझाने में निमित्त होने से इन्द्रियाँ संयम में बाधक ही हैं, साधक नहीं। पंचेन्द्रियों के जीतने के प्रसंग में भी सामान्जनों का ध्यान इन्द्रियों के भोगपक्ष की ओर ही जाता है, ज्ञानपक्ष की ओर कोई ध्यान ही नहीं देता। इन्द्रियसुख को त्यागने की बात तो सभी करते हैं; पर इन्द्रियज्ञान भी हेय है, आत्महित के लिए अर्थात् अतीन्द्रियसुख और अतीन्द्रियज्ञान की प्राप्ति के लिए

इन्द्रियज्ञान की भी उपेक्षा आवश्यक है - इसे बहुत कम लोग जानते हैं।

जब इन्द्रियसुख भोगते-भोगते अतीन्द्रियसुख प्राप्त नहीं किया जा सकता, तब इन्द्रियज्ञान के माध्यम से अतीन्द्रियज्ञान की प्राप्ति कैसे होगी? आत्मा के अनुभव के लिए जिसप्रकार इन्द्रियसुख त्याज्य है; उसीप्रकार अतीन्द्रियज्ञान की प्राप्ति के लिए इन्द्रियज्ञान से भी विराम लेना होगा।

प्रवचननसार में आचार्य कुन्दकुन्द लिखते हैं -

अत्थि अमुत्तं मुत्तं अदिंदियं इंदियं च अत्थेसु।
णाणं च तहा सोक्खं जं तेसु परं च तं णेयं।।५३।।

जिसप्रकार ज्ञान मूर्त-अमूर्त और इन्द्रिय-अतीन्द्रिय होता है; उसीप्रकार सुख भी मूर्त-अमूर्त और इन्द्रिय-अतीन्द्रिय होता है। इनमें इन्द्रियज्ञान और इन्द्रियसुख हेय हैं और अतीन्द्रियज्ञान और अतीन्द्रियसुख उपादेय हैं।

प्रवचनसार की ही पचपनवीं गाथा की उत्थानिका में आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-‘‘ अथेन्द्रियसौख्यसाधनीभूतमिन्द्रियज्ञानं हेयं प्रणिन्दिति।

-अब, इन्द्रियसुख का साधनभूत इन्द्रियज्ञान हेय है - इसप्रकार उसकी निंदा करते हैं।‘‘

इन्द्रियज्ञान से विराम लेने की बात तो बहुत दूरः, आज हम इन्द्रियों के विषयों (भोगों) को भी छोड़ने में नहीं, जोड़ने में लग रहे हैं। पेट के नाम पर पेटी भर रहे हैं। हमसे तो वे चैपाये पशु अच्छे, जिनकी तृष्णा पेट तक ही सीमित है। पेट भर जाने पर वे घंटे-दो-घंटे को ही सही, खाने-पीने से विरत हो जाते हैं; पर प्राणी जगत का यह बुद्धिमान दोपाया सभ्य मानव पल भर को भी विराम नहीं लेता।

यद्यपि अन्य प्राणियों की तुलना में इसका पेट बहुत छोटा है, पर वह कभी भरता ही नहीं। यदि पेट भर भी जावे तो मन नहीं भरता। कहता है पेट के लिए सब-कुछ करना पड़ता है। पर यह सब बहाना है। पेट भर जाने पर भी तो इसका मुँह बंद नहीं होता, चलता ही रहता है। जबतक पेट में समाता है तबतक ऐसा खाना खाता है जो पेट में जावे, पर जब पेट भर जाता है तो पान-सुपारी-इलायची आदि ऐसे पदार्थों को खाने लगता है, जिनसे रसनेन्द्रिय के विषय की तृप्ति तो हो, पर पेट पर वजन न पड़े। कुछ लोग तो ऐसे मिलेंगे जो चैबीसों घंटे मुँह में कुछ-न-कुछ डाले ही रहेंगे। सोते समय भी डाढ़ के नीचे पान दबाकर सोयेंगे।

भरपेट सुस्वादु भोजन कर लेने के बाद भी न मालूम क्यों इन्हें घासपत्ती खाने की इच्छा होती है? लगता है ऐसे लोग तिर्यंच योनि से आये हैं, अतः घास खाने का अभ्यास है जो छूटता नहीं; अथवा तिर्यंच गति में जाने की तैयारी है, इस कारण अभ्यास छोड़ना नहीं चाहते; क्योंकि घास खाने और वह भी चैबीसों घंटे खाने का अभ्यास यदि छूट गया तो फिर क्या होगा? क्योंकि वहाँ तो चैबीसों घंटों ही चरना होगा। अथवा ऐसा भी हो सकता हैं कि नरकगति से आये हों। वहाँ सागरों पर्यन्त भोजन नहीं मिला था, अब मिला है तो उस पर टूट पड़े हैं या फिर नरक जाने की तैयारी है। सोचते हैं कि जितने दिन हैं, खा लें; फिर न मालूम मिलेगा या नहीं।

जो भी हो, पर ऐसे लोग पेट भरने के नाम पर पंचेन्द्रियों के विषयों को ही भोगने में लगे रहते हैं।

मैं पूछता हूँ - प्यासे को मात्र पानी की जरूरत है या ठंडे-मीठे-रंगीन पानी की? पेट को तो पानी की ही जरूरत है - चाहे वह गर्म हो या ठंडा, पर स्पर्शन इन्द्रिय की माँग है ठंडे पानी की, रसनेन्द्रिय की माँग है मीठे पानी की, घ्राण कहती है सुगंधित होना चाहिए, फिर आँख की पुकार होती है रंगीन हो तो ठीक है।

एयरकंडीशन होटल में बैठकर रेडियो का गाान सुनते-सुनते जब हम ठंडा-मीठा-सुगंधित-रंगीन पानी पीते हैं तो एक गिलास का एक रुपया चुकाना पड़ता है। यह एक रुपया क्या प्यासे पेट की आवश्यकता थी? पेट की प्यास तो मुफ्त के एक गिलास पानी से बुझ सकती थी। एक रुपया पेट की प्यास बुझाने में नहीं, इन्द्रियों की प्यास बुझाने में गया है।

इन्द्रियों के गुलामों को न दिन का विचार है न रात का, न भक्ष्य का विचार है न अभक्ष्य का। उन्हें तो जब जैसा मिल जावे खाने-पीने-भोगने को तैयार हैं। बस उनकी तो एक ही माँग है कि इन्द्रियों को अनुकूल लगना चाहिए; चाहे वह पदार्थ हिंसा से उत्पन्न हुआ हो, चाहे मलिन ही क्यों न हो, इसका उन्हें कोई विचार नहीं रहता।

जिनके भक्षण में अनंत जीवराशि का भी विनाश क्यों न हो - ऐसे पदार्थों के सेवन में भी इन्हें कोई परहेज नहीं होता, बल्कि उनका सेवन नहीं करने वालों की हँसी करने में ही इन्हें रस आता है। वे अपने असंयम की पुष्टि में अनेक प्रकार की कुतर्कें करते रहते हैं।

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एक सभा के बीच ऐसे ही एक भाई मुझसे बोले - ‘‘हमने सुना है कि आलू आदि जमीकंदों में अनंत जीव रहते हैं?‘‘

जब मैंने कहा - ‘‘रहते तो हैं।‘‘ तब कहने लगे - ‘‘उनकी आयु कितनी होती है?‘‘

‘‘एक श्वास के अठारहवें भाग‘‘ - यह उत्तर पाकर बोले - ‘‘जब उनकी आयु ही इतनी कम है तो वे तो अपनी आयु की समाप्ति से ही मरते होंगे, हमारे खाने से तो मरते नहीं। फिर इनके खाने में क्या दोष है?‘‘

मैंने कहा - ‘‘भाई! जरा विचार तो करो। भले ही वे अपनी आयु समाप्ति के कारण मरते हों, पर मरते तो तुम्हारे मुँह में हैं; और वहीं जन्म भी लेते हैं। जरा से स्वाद के लिए अनंत जीवों का मुर्दाघर और जच्चाखाना अपने मुँह को, पेट को क्यों बनाते हो?

यदि कोई तुम्हारे घर को जच्चाखाना बनाना चाहे या मुर्दाघर बनाना चाहे, तो क्या सहज स्वीकार कर लोगे?‘‘

‘‘नहीं।‘‘

‘‘तो फिर मुँह को, पेट को क्यों बनाते हो?‘‘

तब वे कहने लगे - ‘‘हम उन्हें मारते तो नहीं, वे स्वयं मर जाते हैं।‘‘

तब प्रेम से समझाते हुए मैंने कहा - ‘‘ आपके घर में किसी को मारकर नहीं जलावेंगे, उन्हीं को जलावेंगे जो स्वयं की मौत से मरेंगे तथा अवैध बच्चों को नहीं, पर वैध बच्चों को पैदा करने वाली जच्चाओं को ही रखेंगे, तब तो आपको कोई ऐतराज न होगा?

यदि होगा तो फिर स्वयंमृत और जन्म लेने वाले जीवों का मरणस्थान और जन्मस्थान अपने मुंह को क्यों बनाना चाहते हो?

भाई! राग की तीव्रता और अधिकता बिना ऐसे निऩ्द्य काम सम्भव नहीं हैं। राग की तीव्रता और अधिकता ही महाहिंसा है। अतः हिंसामूलक एवं इन्द्रियों की लोलुपतारूप ऐसे असंयम को छोड़ ही देना चाहिए।’’

यह बात सुनकर उन भाई ने तो अभक्ष्य-भक्षण छोड़ ही दिया और भी अनेक लोगों ने हिंसामूलक एवं इन्द्रिगृद्धतारूप अभक्ष्य-भक्षण का त्याग किया।

यद्यपि सारा जगत इन्द्रियों के भोगों में ही उलझा है, तथापि वैराग्य का वातावरण पाकर भोगों को छोड़ देना उतना कठिन नहीं है; जितना इन्द्रियों के माध्यम से होनेवाली ज्ञान की बर्बादी रोकना है; क्योंकि इन्द्रियभोगों को तो सारा जगत बुरा कहता है, पर इन्द्रियज्ञान को उपायोग माने बैठा है। जिसे उपादेय माना हो, उसे छोड़ने का प्रश्न ही कहां उठता है?

यहां एक प्रश्न सम्भव है कि इन्द्रियों के माध्यम से तो ज्ञान उत्पन्न होता है और आप बर्बाद होना कहते हैं?

हाँ! हम यही कहते है और ठीक कहते हैं; क्योंकि ज्ञान की उत्पत्ति तो आत्मा में आत्मा से ही होती है। इन्द्रियों के माध्यम से तो वह बाहृ पदार्थों में लगता है, पर-पदार्थों में लगता है। इन्द्रियों के माध्यम से पुद्गल का ही ज्ञान होता है, क्योंकि वे रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द की ग्राहक हैं। आत्मा का हित आत्म केा जानने में है, अतः पर में लगा ज्ञान का क्षयोपशम ज्ञान की बर्बादी ही है, आबादी नहीं।

अनादिकाल से आत्मा ने पर को जाना, पर आज तक सुखी नहीं हुआ; किन्तु एक बार भी यदि आत्मा अपने आत्मा को जान लेता तो सुखी हुए बिना नहीं रहता।

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यह तो ठी, पर इससे संयम का क्या सम्बन्ध? यही कि संयमन का नाम ही तो संयम है,उपयोग को पर-पदार्थों से समेटकर निज में लीन होना ही संयम है। जैस कि ’धवल’ में कहा है और जिसे आरम्भ में भी स्पष्ट किया जा चुका है।

यह आत्मा पर की खोज में इतना व्यस्त है और असंयमित हो गया है कि खोजने वाला ही खो गया है। परज्ञेय का लोभी यह आत्मा स्वज्ञेय को भूल ही गया है। बाह्य पदार्थों की जानने की व्यग्रता में अंतर में झांकने की फुर्सत ही नहीं है इसे।

यह एक ऐसा सेठ बन गया है जिसकी टेबल पर पांच-पांच फोन लगे हैं। एक से बात समाप्त नहीं होती कि दूसरे फोन की घंटी टनटना उठती है। उससे भी बात पूरी नहीं हो पाती कि तीसरा फोन बोल उठता है। इसीप्रकार फोनों का सिलसिला चलता रहता है। फोन पांच-पांच हैं और उनकी बात सुनने वाला एक है।

इसीप्रकार इंद्रियों पांच हैं और उनके माध्यम से जानने वाला आत्मा एक है। बाहरी तत्व पुद्गल की रूप-रस-गंध-स्पर्श-शब्द सम्बंधी सूचनाएं इन्द्रियों के माध्यम से निरंतर आती रहती है। कानों के माध्यम से सूचना मिलती है कि हल्ला-गुल्ला कहां हो रहा है? उस पर विचार ही नहीं कर पाता कि नाक कहती है - बदबू आ रही है। उसके बारे में कुछ सोचे कि आंख के माध्यम से कुछ काला-पीला दिखने लगता है। उसका कुछ िवचार करे कि ठंडी हवा या गर्म लू का झोंका अपनी सत्ता का ज्ञान कराने लगता है। उससे सावधान भी नहीं हो पाता कि मुंह में रखे पान में यह कड़वापन कहां से आ गया - रसना यह सूचना देने लगती है।

क्या करे यह बेचारा आत्मा? बाहर की सूचनाएं और जानकरियों ही इतनी आती रहती है कि अन्तर में जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण आत्मतत्ःव विराजमान है, उसकी ओर झांकने की भी इसे फुर्सत नहीं है।

इंद्रियों के माध्यम से परज्ञेयों में उलझा वह आत्मा स्वज्ञेय निजात्मा को आज तक जान ही नही पाया - उसे माने कैसे, उसमें जमें कैसे, रमे कैसे? यह एक विकट समस्या है।

आत्मा में जमना-रमना ही संयम है। अतः संयम को प्राप्त करने के लिए मात्र इन्द्रियभोगों को नहीं, इन्द्रियज्ञान को भी तिलांजलित देनी होगी, चाहे वह अंतर्मुहूर्त को ही सही। इन्द्रियज्ञान में उपादेय बुद्धि तो छोड़ने ही होगी। उसके बिना तो सम्यग्दर्शन भी सम्भ्व नहीं है और सम्यग्दर्शन के बिना संयम होता नहीं है।

’पंचेन्द्रिय मन वश करो’ का आशय इन्द्रियें को तोड़ना-फोड़ना नहीं, वरन् उनके भोगों एवं उनके माध्यम से होनेवाली ज्ञान की बर्बादी को रोकना ही है।

यहां एक प्रश्न यह भी सम्भव है कि आत्मा का स्वभाव स्वपर-प्रकाशक है,तो फिर पर को जानने में क्या हानि है?

पर को जाननामात्र बंध का कारण नहीं है। केवली भगवान पर को जानते ही हैं। यदि लोकालोक को जाननेवाला पूर्णज्ञान हो तो फिर पर को नहीं जानने का कोई प्रश नही नहीं उठता। पर बात यह है कि छद्मस्थों (अल्पज्ञानियों) का उपयोग एक साथ अनेक ओर नहीं रहता, एक बार एक ज्ञेय को ही जानता है। जब उनका उपयोग पर की ओर रहता है तब आत्मा जानने में नहीं आता, आ भी नहीं सकता। यही कारण हे कि परमें उपयेग लगे रहने से आत्मा के जानने में, आत्मानुभूति में बाधा पहुंचती है। दूसरे इन्द्रियों के माध्यम से जितना भी जानना होता है, वह सब पुद्गल का ही होता है। यही कारण है कि इन्द्रियज्ञान आत्मज्ञान में साधक नहीं, बल्कि बाधक है; पर यह अपने को चतुर मानने वाला जगत कहता है कि अपना पाडा यदि दसूरे की भैंस का दूध पी आवे तो क्या हानि है; अपनी भैंस का दूध दूसरों के पाडे को नहीं पीने देनाचाहिए। परउसे यह पता नहीं है - यदि अपना पाडा प्रतिदिन दूसरे की भैंस का दूध पीता रहेगा तो एक दिन वह उसी का हो जावेगा। उसी को अपनी माँ मानने लगेगा, जिसका दूध उसे प्रतिदिन मिलेगा। फिर वह अपनी भैंस को अपनी माँ न मान सकेगा।

आप समझते रहेंगे कि आपका पाडादूसरे की भैंस का दूध पी रहा है, पर वह समझता है कि उसकी भैंस को बच्चा मिल गया है।

इसीप्रकार निरंतन पर को ही जानने वाला ज्ञान भी एक तरह से पर का ही हो जाता है। वस्तुतः आत्मा को जानने वाला ज्ञान ही आत्मा का है, आत्मज्ञान है। पर को जानने वाला ज्ञान एक दृष्टि से ज्ञान ही नहीं है; वह तो अज्ञान है, ज्ञान की बर्बादी है। लिखा भी है -

आत्मज्ञान ही ज्ञान है, शेष सभी अज्ञान।
विश्वशान्ति का मूल है, वीतराग-विज्ञान।।1

संयम की सर्वोत्कृष्ट दशा ध्यान है। वह आंख बंद करके होता है, खोलकर नहीं। इससे भी यही सिद्ध होता है कि आत्मानुभव एवं आत्मध्यान इन्द्रियतीत हेाता है; आत्मानुभव एवं आत्माध्यानरूप संयम के लिए इन्द्रियों के प्रयोग की आवश्यकता नहीं है।

इन्द्रियज्ञान को भी हेय मानने वाले आत्मार्थी का जीवन अमर्यादित इन्द्रियभोगों में लगा रहे, यह संभव नहीं है। कहा भी है -

ग्यान कला जिनके घट जागी, ते जगमांहि सहज वैरागी।
ग्यानी मगन विषैसुख माँही, यह विपरीत संभवै नाहीं।।41।।2

उत्तूमसंयम के धारी महाव्रती मुनिराजों के तो भेग की प्रवृत्ति देखी ही नहीं जाती। देशसंयमी अणुव्रती श्रावक के यद्यपि मर्यादित भोगों की प्रवृत्ति देखी जाती है, यथापि उसके तथा अव्रती सम्यग्दृष्टि के भी अनर्गल प्रवृत्ति नहीं होती।

अत्मा के आश्रय से उत्पन्न होने वाला अन्तर्बाह्य उत्तमसंयम धर्म हम सबको शीघ्रातिशीघ्र प्रकट हो, इस पवित्र भावना के साथ विराम लेता हूँ और भावना भाता हूँ कि - ’वो दिन कब पाऊँ, घर को छोड़ वन जाऊँ।’