भक्तामर स्तोत्र अर्घावली
-स्थापना-
भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-
मुद्योतवंâ दलित-पाप-तमो-वितानम्।
सम्यक्प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादा-
वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम् ।।१।।
आदिपुरुष आदीश जिन, आदि सुविधि करतार।
धरम धुरन्धर परम गुरु, नमों आदि अवतार।।
सुरनत-मुकुट रतन छवि करें, अन्तर पाप तिमिर सब हरें।
जिनपद वन्दों मनवचकाय, भवजल पतित-उधरन सहाय।।

ॐ ह्रीं प्रणतदेवसमूह मुकुटाग्रमणिद्योतकाय महापापान्धकार विनाशनाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।१।।


य: संस्तुत: सकल-वाङ्मय-तत्त्वबोधा-
दुद्भूत-बुद्धि-पटुभि: सुरलोक-नाथै:।
स्तोत्रैर्जगत्त्रितय-चित्त-हरै-रुदारै:,
स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम् ।।२।।
श्रुत-पारग-इन्द्रादिक देव, जाकी थुति कीनी कर सेव।
शब्द मनोहर अरथ विशाल, तिस प्रभु की वरनों गुनमाल।।

ॐ ह्रीं गणधर-चारणसमस्त-ऋषीन्द्र-चन्द्रादित्य-सुरेन्द्र-नरेन्द्र- व्यंतरेन्द्र-नागेन्द्र-चतुर्विध मुनीन्द्रस्तुत चरणारविंदाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।२।।


बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ,
स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोऽहम्।
बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब-
मन्य: क इच्छति जन: सहसा ग्रहीतुम।।३।।
विबुध-वंद्यपद! मैं मति-हीन, हो निलज्ज थुति मनसा कीन।
जल-प्रतिबिम्ब बुद्ध को गहै;, शशिमण्डल बालक ही चहै।।

ॐ ह्रीं विगतबुद्धि गर्वापहार सहित श्रीमन्मानतुंगाचार्य भक्तिसहिताय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।३।।


वत्तुंâ गुणान् गुण-समुद्र शशांक-कान्तान्,
कस्ते क्षम: सुर-गुरु-प्रतिमोऽपि बुद्ध्या।
कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-नक्र-चव्रंâ,
को वा तरीतु-मलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम्।।४।।
गुनसमुद्र तुम गुन अविकार, कहत न सुरगुरु पावें पार।
प्रलय पवन उद्धत जलजन्तु, जलधि तिरै को भुज बलवन्तु।।

ॐ ह्रीं त्रिभुवनगुणसमुद्र चन्द्रकान्तिमणितेजशरीर समस्त- सुरनाथस्तुत श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।४।।


सोऽहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश,
कर्तुं स्तवं विगत-शक्ति-रपि प्रवृत्त:।
प्रीत्यात्म-वीर्य-मविचाय्र्य मृगी मृगेन्द्रं,
नाऽभ्येति विंâ निज-शिशो: परि-पालनार्थम्।।५।।
सो मैं शक्तिहीन थुति करूँ, भक्तिभाववश कछु नहिं डरूँ।
ज्यों मृगि निज सुत पालन हेत, मृगपति सन्मुख जाय अचेत।।

ॐ ह्रीं समस्तगणधरादि-मुनिवरप्रतिपालक मृगबालवत् श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।५।।


अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहास - धाम,
त्वद्भक्ति-रेव-मुखरी-कुरुते बलान्माम्।
यत्कोकिल: किल मधौ मधुरं विरौति,
तच्चाम्र-चारु-कलिका-निकरैक-हेतु।।६।।
मैं शठ सुधी-हंसन को धाम, मुझ तुव भक्ति बुलावै राम।
ज्यों पिक अम्ब-कली परभाव, मधु ऋतु मधुर करै आराव।।

ॐ ह्रीं जिनेन्द्रचन्द्रभक्ति सर्वसौख्य तुच्छभक्ति बहुसुखदायकाय जिनेन्द्राय जिनादिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।६।।


त्वत्संस्तवेन भव-सन्तति-सन्निबद्धं,
पापं क्षणात्क्षय-मुपैति शरीर-भाजाम् ।
आक्रान्त-लोक-मलिनील-मशेष-माशु,
सूर्यांशु-भिन्न-मिव शार्वर-मन्धकारम् ।।७।।
तुम जस जंपत जन छिनमाहिं, जनम जनम के पाप नशाहिं।
ज्यों रवि उगै फटै तत्काल, अलिवत् नील निशा-तम-जाल।।

ॐ ह्रीं अनंतभव-पातक सर्व विनाशकाय तवस्तुति सौख्यदायकाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।७।।


मत्वेति नाथ! तव संस्तवनं मयेद-
मारभ्यते तनुधियाऽपि तव प्रभावात् ।
चेतो हरिष्यति सतां नलिनी-दलेषु,
मुक्ताफल-द्युति-मुपैति ननूद-बिंदु:।।८।।
तुव प्रभावतैं कहूँ विचार, होती यह थुति जन-मनहार।
ज्यों जल कमल पत्र पै परै, मुक्ताफल की द्युति विस्तरै।।

ॐ ह्रीं जिनेन्द्रस्तवन सत्पुरुष चिच्चमत्काराय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।८।।


आस्तां तव स्तवन-मस्त-समस्त-दोषं,
त्वत्संकथापि जगतां दुरितानि हन्ति।
दूरे सहस्र-किरण: कुरुते प्रभैव,
पद्माकरेषु जलजानि विकास-भांजि।।९।।
तुम गुन महिमा हत दुख-दोष, सो तो दूर रहो सुखपोष।
पाप विनाशक है तुम नाम, कमल विकासी ज्यों रविधाम।।

ॐ ह्रीं श्रीजिनपूजन-स्तवन-कथाश्रवणेन जगत्त्रयभव्यजीव समस्तपापौघविनाशनाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा ।।९।।


नात्यद्भुतं भुवन - भूषण - भूतनाथ,
भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्त - मभिष्टु - वन्त:।
तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन विंâ वा,
भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति।।१०।।
नहिं अचंभ जो होंहिं तुरंत, तुमसे तुम गुण वरणत सन्त।
जो अधीन को आप समान, करैं न सो निन्दित धनवान।।

ॐ ह्रीं त्रैलोक्यानुपमगुणमंडित समस्तोपमासहिताय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।१०।।


दृष्ट्वा भवन्त-मनिमेष-विलोकनीयं,
नान्यत्र तोष-मुपयाति जनस्य चक्षु:।
पीत्त्वा पय: शशिकर-द्युति-दुग्ध-सिन्धो;,
क्षारं जलं जलनिधेरसितुं क इच्छेत् ।।११।।
इक टक जन तुमको अविलोय, अवरविषै रति करे न सोय।
को करि क्षीरजलधि जलपान, क्षार नीर पीवै मतिमान।।

ॐ ह्रीं जिनेन्द्रदर्शन अनंतभवसंचित अघसमूहविनाशनाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।११।।


यै: शान्त-राग-रुचिभि: परमाणु-भिस्त्वं,
निर्मापितस्त्रि - भुवनैक - ललाम - भूत।
तावन्त एव खलु तेऽप्यणव: पृथिव्यां,
यत्ते समान-मपरं न हि रूपमस्ति।।२।।
प्रभु तुम वीतराग गुणलीन, जिन परमाणु देह तुम कीन।
हैं जितने ही ते परमाणु, यातै तुम सम रूप न आनु।।

ॐ ह्रीं त्रिभुवनशान्तिस्वरूपगुण त्रिभुवनतिलकाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।१२।।


वक्त्रं क्व ते सुर-नरोरगनेत्र-हारि,
नि:शेष-निर्जित-जगत्त्रित-योपमानम्।
बिम्बं कलंक-मलिनं क्व निशाकरस्य,
यद्वासरे भवति पाण्डु-पलाश-कल्पम् ।।१३।।
कहं तुम मुख अनुपम अविकार, सुरनरनागनयनमनहार।
कहाँ चन्द्र-मंडल सकलंक, दिन में ढाक पत्र सम रंक।।

ॐ ह्रीं त्रैलोक्यविजयी रूपातिशय अनंतचन्द्रतेजोजितृ सदातेज-पुंजायमान श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।१३।।


सम्पूर्ण-मण्डल-शशांक-कला कलाप-
शुभ्रा गुणास्त्रिभुवनं तव लङ्घयन्ति।
ये संश्रितास्त्रिजगदीश्वर - नाथमेवंâ,
कस्तान्निवारयति संचरतो यथेष्टम् ।।१४।।
पूरन चंद जोति छविवंत, तुम गुन तीन जगत लंघंत।
एक नाथ त्रिभुवन आधार, तिन विचरत को करै निवार।।

ॐ ह्रीं शुभ्रगुणातिशयरूप त्रिभुवन जिनजिनेन्द्रगुण विराजमानाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।१४।।


चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशांगनाभि-
र्नीतं मनागपि मनो न विकार-मार्गम्।
कल्पान्त-काल-मरुता चलिता-चलेन,
विंâ मन्दराद्रि-शिखरं चलितं कदाचित्।।१५।।
जो सुरतिय विभ्रम आरम्भ, मन न डिग्यो तुम तो न अचम्भ।
अचल चलावै, प्रलय समीर, मेरु शिखर डगमगै न धीर।।

ॐ ह्रीं मेरुवद्अचल शीलशिरोमणये चतुर्विधवनिताविकाररहित शीलसमुद्राय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।१५।।


निर्धूम - वत्र्ति - रपवर्जित - तैलपूर:,
कृत्स्नं जगत्त्रयमिदं प्रकटी-करोषि।
गम्यो न जातु मरुतां चलिता-चलानां,
दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ जगत्प्रकाश:।।१६।।
धूमरहित बातीगतनेह, परकाशै त्रिभुवनघर एह।
वात-गम्य नाहीं परचण्ड, अपर दीप तुम बलो अखण्ड।।

ॐ ह्रीं धूमस्नेहवत्र्यादिविघ्नरहित त्रैलोक्य परमकेवलदीपकाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।१६।।


नास्तं कदाचिदुपयासि न राहु-गम्य:,
स्पष्टी-करोषि सहसा युगपज्जगन्ति।
नाम्भोधरोदर - निरुद्ध - महा - प्रभाव:,
सूर्यातिशायि-महिमासि मुनीन्द्र लोके।।१७।।
छिपहु न लुपहु राहु की छांहि, जग-परकाशक हो छिन मांहि।
घन-अनवर्त दाह विनिवार, रवि तैं अधिक धरो गुणसार।।

ॐ ह्रीं राहुचन्द्रपूजित निरावरणज्योतिरूप लोकालोकित सदोदयाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।१७।।


नित्योदयं दलित-मोह-महान्धकारं।
गम्यं न राहु-वदनस्य न वारिदानाम्।।
विभ्राजते तव मुखाब्ज-मनल्प-कान्ति,
विद्योतयज्-जगदपूर्व-शशांक-बिम्बम्।।१८।।
सदा उदित विदलित मनमोह, विघटित मेघ राहु-अवरोह।
तुम मुख कमल अपूरब चन्द, जगत विकाशी जोति अमन्द।।

ॐ ह्रीं नित्योदयरूप अगम्य राहु त्रिभुवनसर्वकलासहित विराजमानाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।१८।।


विंâ शर्वरीषु शशिनान्हि विवस्वता वा,
युष्मन्मुखेन्दु-दलितेषु तम:सु नाथ।
निष्पन्न-शालि-वन-शालिनि जीव-लोके,
कार्यं कियज्-जलधरैर्जल-भारनम्रै:।।१९।।
निशदिन शशि रविको नहिं काम, तुम मुखचन्द हरै तम धाम।
जो स्वभावतैं उपजे नाज, सजल मेघ तैं कौनहु काज।।

ॐ ह्रीं चन्द्रसूर्योदयास्त रजनी-दिवारहित परमकेवलोदय सदा दीप्तिविराजमानाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।१९।।


ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं,
नैवं तथा हरि - हरादिषु नायकेषु।
तेज:स्पुâरन्मणिषु याति यथा महत्त्वं,
नैवं तु काच-शकले किरणा-कुलेऽपि।।२०।।
जो सुबोध सोहे तुम मांहि, हरि हर आदिक में सो नाहिं।
जो द्युति महा रतन में होहि, काँच खण्ड पावै नहिं सोय।।

ॐ ह्रीं हरिहरादिज्ञानरहित परमज्योतिकेवलज्ञानसहिताय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।२०।।


मन्ये वरं हरि - हरादय एव दृष्टा,
दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति।
विंâ वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्य:,
कश्चिन्मनो हरति नाथ भवान्तरेऽपि।।२१।।
सराग देव देख मैं भला विशेष मानिया,
स्वरूप जाहि देख वीतराग तू पिछानिया।
कछू न तोहि देख के जहाँ तुही विशेखिया,
मनोग चित्त चोर और भूल हू न पेखिया।।

ॐ ह्रीं त्रिभुवनमनोमोहन जिनेन्द्ररूपान्यदृष्टान्तरहित परम मंडिताय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।२१।।


स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्-
नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता।
सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मिं,
प्राच्येव दिग्जनयति स्पुâर-दंशु-जालम् ।।२२।।
अनेक पुत्रवंतिनी नितम्बिनी सपूत हैं,
न तो समान पुत्र और मात तैं प्रसूत हैं।।
दिशा धरंत तारिका अनेक कोटि को गिनै,
दिनेश तेजवन्त एक पूर्व ही दिशा जनै।।

ॐ ह्रीं श्रीजिनवरमाताजनित जिनेन्द्रपूर्वदिग्भास्कर केवलज्ञान भास्कराय श्रीआदिब्रह्मजिनाय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।२२।।


त्वामा-मनन्ति मुनय: परमं पुमांस-
मादित्य-वर्ण-ममलं तमस: पुरस्तात्
त्वामेव सम्य-गुपलभ्य जयन्ति मृत्युं,
नान्य: शिव: शिव-पदस्य मुनीन्द्र पन्था:।।२३।।
पुरान हो पुमान हो पुनीत पुण्यवान हो,
कहैं मुनीश अंधकार नाश को सुभान हो।
महंत तोहि जानि के न होय वश्य काल के,
न और कोइ मोख पन्थ देय तोहि टाल के।।

ॐ ह्रीं त्रैलोक्यपावनादित्यवर्ण परमअष्टोत्तरशतलक्षण नवशत व्यंजनाय समुदाय एकसहस्रअष्टमंडिताय श्रीआदिजिनेन्द्राय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।२३।।


त्वा-मव्ययं विभु-मचिन्त्य-मसंख्य-माद्यं,
ब्रह्माण-मीश्वर-मनन्त-मनंग केतुम्।
योगीश्वरं विदित-योग-मनेक-मेवंâ,
ज्ञान-स्वरूप-ममलं प्रवदन्ति सन्त:।।२४।।
अनन्त नित्य चित्त के अगम्य रम्य आदि हो,
असंख्य सर्वव्यापि विष्णु ब्रह्म हो अनादि हो।
महेश कामकेतु योग-ईश योग ज्ञान हो,
अनेक एक ज्ञानरूप शुद्ध सन्त-मान हो।।

ॐ ह्रीं ब्रह्मा-विष्णु-श्रीवंâठ-गणपति त्रिभुवनदेवत्वसहिताय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।२४।।


बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित-बुद्धि-बोधा-
त्त्वं शंकरोऽसि भुवन-त्रय-शंकरत्वात् ।
धातासि धीर शिव-मार्ग-विधे-र्विधानात्,
व्यत्तंâ त्वमेव भगवन् पुरुषोत्तमो सि।।२५।।
तुही जिनेश बुद्ध है सुबुद्धि के प्रमानतैं,
तुही जिनेश शंकरो जगत्त्रयी विधानतैं।
तुही विधात है सही सुमोख पंथ धारतैं,
नरोत्तमो तुही प्रसिद्ध अर्थ के विचारतैं।।

ॐ ह्रीं बुद्धशंकरशेषधरब्रह्मानाम् सहिताय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।२५।।


तुभ्यं नम-स्त्रिभुवनार्ति-हराय नाथ,
तुभ्यं नम: क्षिति-तलामल-भूषणाय।
तुभ्यं नमस्त्रिजगत: परमेश्वराय,
तुभ्यं नमो जिन भवोदधि-शोषणाय।।२६।।
नमों करूँ जिनेश तोहि आपदा-निवार हो,
नमों करूँ सुभूरि भूमि-लोक के सिंगार हो।
नमों करूँ भवाब्धि-नीर-राशि-शोष हेतु हो,
नमों करूँ महेश तोहि मोखपंथ देतु हो।।

ॐ ह्रीं अधोलोक-मध्यलोक-ऊध्र्वलोकत्रय कृताहोरात्रिनमस्कार समस्तार्तरौद्रविनाशक त्रिभुवनेश्वराय भवदधितरणतारणसमर्थाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।२६।।


को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणैरशेषै-
स्त्वं संश्रितो निरवकाश-तया मुनीश।
दोषै-रुपात्त-विविधाश्रय-जात-गर्वै:,
स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिद-पीक्षितोसि।।२७।।
तुम जिन पूरण गुणगण भरे, दोष गर्व करि तुम परिहरे।
और देवगण आश्रय पाय, स्वप्न न देखे तुम फिर आय।।

ॐ ह्रीं श्री परमगुणाश्रितावगुणानाश्रित श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।२७।।


उच्चैर-शोक-तरु-संश्रित-मुन्मयूख-
माभाति रूप-ममलं भवतो नितान्तम्।
स्पष्टोल्लसत्-किरणमस्त-तमो-वितानं,
बिम्बं रवेरिव पयोधर - पाश्र्ववर्ति।।२८।।
तरु अशोक तल किरण उदार, तुम तन शोभित है अविकार।
मेघ-निकट ज्यों तेज पुâरंत, दिनकर दिपै तिमिर निहनंत।।

ॐ ह्रीं अशोकवृक्ष प्रातिहार्यसहिताय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।२८।।


सिंहासने मणि-मयूख-शिखा-विचित्रे,
विभ्राजते तव वपु: कनका-वदातम् ।
बिम्बं वियद्-विलस-दंशु-लता-वितानं,
तुंगोदयाद्रि - शिरसीव सहस्र - रश्मे:।।२९।।
सिंहासन मणि किरण विचित्र, तापर वंâचन वरण पवित्र।
तुम तन शोभित किरण विथार, ज्यों उदयाचल रवि तमहार।।

ॐ ह्रीं सिंहासन प्रातिहार्यसहिताय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।२९।।


कुन्दावदात-चल-चामर-चारु-शोभं,
विभ्राजते तव वपु: कलधौत-कान्तम्।
उद्यच्छशांक-शुचि-निर्झर-वारि-धार-
मुच्चैस्तटं सुर-गिरेरिव शात-कौम्भम् ।।३०।।
कुन्द पुहुप सित-चमर ढुरंत, कनक-वरन तुम तन शोभंत।
ज्यों सुमेरु तट निर्मल कांति, झरना झरै नीर उमगांति।।

ॐ ह्रीं श्री चतु:षष्टिचामर प्रातिहार्यसहिताय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।। ३०।।


छत्र-त्रयं तव विभाति शशांक-कान्त-
मुच्चै: स्थितं स्थगित-भानु-कर-प्रतापम्।
मुक्ता-फल-प्रकर-जाल-विवृद्ध-शोभं,
प्रख्यापयत्-त्रिजगत: परमेश्वरत्वम्।।३१।।
ऊँचे रहैं सूर-दुति लोप, तीन छत्र तुम दिपै अगोप।
तीन लोक की प्रभुता कहैं, मोती झालर सों छवि लहैं।।

ॐ ह्रीं श्री छत्रत्रयप्रातिहार्यसहिताय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।३१।।


गम्भीर-तार-रव-पूरित-दिग्विभाग-
स्त्रैलोक्य-लोक-शुभ-संगम-भूति-दक्ष:।
सद्धर्म-राज-जय-घोषण-घोषक: सन्,
खे दुन्दुभिर्-ध्वनति ते यशस: प्रवादी।।३२।।
दुन्दुभि शब्द गहर गंभीर, चहुँ दिश होय तुम्हारे धीर।
त्रिभुवन-जन शिव संगम करै, मानों जय जय रव उच्चरै।।

ॐ ह्रीं अष्टादशकोटिवादित्र प्रातिहार्यसहिताय श्रीपरमादि-परमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।३२।।


मन्दार-सुन्दर-नमेरु-सुपारिजात,
सन्तानकादि-कुसुमोत्कर-वृष्टिरुद्धा।
गन्धोद-बिन्दु-शुभ-मन्द मरुत्प्रपाता,
दिव्या दिव: पतति ते वचसां ततिर्वा।।३३।।
मन्द पवन गन्धोदक इष्ट, विविध कल्पतरु पुहुप सुवृष्टि।
देव करैं विकसित दल सार, मानों द्विज पंकति अवतार।।

ॐ ह्रीं समस्त पुष्पजातिवृष्टिप्रतिहार्यसहिताय श्रीपरमादि-परमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।३३।।


शुम्भत्प्रभा-वलय-भूरि-विभा विभोस्ते,
लोकत्रये द्युतिमतां द्युतिमा-क्षिपन्ती।
प्रोद्यद्दिवाकर-निरन्तर-भूरि-संख्या,
दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोम-सौम्याम्।।३४।।
तुम तन भामण्डल जिनचंद, सब दुतिवन्त करत है मंद।
कोटि शंख रवितेज छिपाय, शशि निर्मल निशि करै अछाय।।

ॐ ह्रीं श्री कोटिभास्करप्रभामण्डित भामण्डलप्रातिहार्यसहिताय श्रीपरमादिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।३४।।


स्वर्गा-पवर्ग-गममार्ग-विमार्गणेष्ट:,
सद्धर्म तत्त्व-कथनैक-पटुस्-त्रिलोक्या:।
दिव्य-ध्वनिर्-भवति ते विशदार्थ-सर्व-
भाषा-स्वभाव-परिणाम-गुणै: प्रयोज्य:।।३५।।
स्वर्ग मोक्ष मारग संकेत, परम धरम उपदेशन हेत।
दिव्य वचन तुम खिरैं अगाध, सब भाषा-गर्भित हितसाध।।

ॐ ह्रीं जलधरपटल गर्जित ध्वनियोजनप्रमाणप्रातिहार्यसहिताय श्रीपरमादिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।३५।।


उन्निद्र - हेम - नवपंकजपुंज - कान्ती,
पर्युल्लसन्नख-मयूख-शिखा-भिरामौ।।
पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र धत्त:,
पद्मानि तत्र विबुधा परि-कल्पयन्ति।।३६।।
विकसित सुवरन कमल-दुति, नख-दुति मिलि चमकाहिं।
तुम पद पदवी जहं धरैं, तहं सुर कमल रचाहिं।।

ॐ ह्रीं हेमकमलोपरिकृतगमन देवकृतातिशयसहिताय श्रीपरमादिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।३६।।


इत्थं यथा तव विभूति-रभूज्जिनेन्द्र,
धर्मोप-देशन विधौ न तथा परस्य।
यादृक् प्रभा दिनकृत: प्रहतान्ध-कारा,
तादृक्कुतो ग्रह-गणस्य विकासिनोपि।।३७।।
जैसी महिमा तुम विषै, और धरें नहिं कोय।
सूरज में जो जोति है, नहिं तारागण होय।।

ॐ ह्रीं धर्मोपदेशसमये समवसरणविभूतिमंडिताय श्रीपरमादि-परमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा ।।३७।।


श्च्योतन्-मदा-विल-विलोल-कपोल-मूल-
मत्त-भ्रमद्-भ्रमर-नाद-विवृद्ध-कोपम्।
ऐरावताभ - मिभ - मुद्धत - मापतन्तं,
दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदा-श्रितानाम्।।३८।।
मद-अवलिप्त-कपोल-मूल अलि कुल झंकारै,
तिन सुन शब्द प्रचण्ड क्रोध उद्धत अति धारै।
काल वरन विकराल कालवय सन्मुख आवै,
ऐरावत सों प्रबल सकल जन भय उपजावै।।
दैखि गयन्द न भय करै, तुम पद महिमा लीन।
विपति-रहित संपति सहित, वरतैं भक्त अदीन।।

ॐ ह्रीं मस्तक गलितमद सुरगजेन्द्रमहादुद्धर भयविनाशकाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।३८।।


भिन्नेभ-कुम्भ-गल-दुज्ज्वल-शोणिताक्त-
मुक्ताफल-प्रकर-भूषित-भूमिभाग:।
बद्ध-क्रम: क्रम-गतं हरिणा-धिपोऽपि,
नाक्रामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते।।३९।।
अति मदमत्त गयन्द कुम्भथल नखन विदारै,
मोती रक्त समेत डारि भूतल सिंगारै।
बांकी दाढ़ विशाल वदन में रसना लोलै,
भीम भयानक रूप देखि जन थरहर डोलै।।
ऐसे मृगपति पद तलैं, जो नर आयो होय।
शरण गहे तुम चरण की, बाधा करै न सोय।।

ॐ ह्रीं आदिदेव प्रसादान्महासिंहभयविनाशकाय श्रीयुगादिदेव-परमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।३९।।


कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-वन्हि-कल्पं,
दावानलं ज्वलित-मुज्वल-मुत्स्पुâलिंगम्।
विश्वं जिघित्सुमिव सम्मुख-मापतन्तं,
त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्य-शेषम्।।४०।।
प्रलय पवन कर उठी आज जो तास पटंतर,
वमैं पुâलिंग शिखा-उत्तंग परजलैं निरंतर।
जगत समस्त निगल्ल भस्म करहैगी मानों,
तड़तड़ात दव अनल जोर चहुँ दिशा उठानों।।
सो इक छिन में उपशमें, नाम नीर तव लेत।
होय सरोवर परिणमैं, विकसित कमल समेत।।

ॐ ह्रीं श्रीविश्वभक्षणसमर्थ महावन्हिविनाशकाय जिननामजलाय श्रीआदिब्रह्मणे अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।४०।।


रत्तेâक्षणं समद-कोकिल-कण्ठ-नीलं,
क्रोधोद्धतं फणिन-मुत्फण-मापतन्तम्।
आक्रामति क्रमयुगेण निरस्त-शंकस्-
त्वन्नाम-नाग-दमनी हृदि यस्य पुंस:।।४१।।
कोकिल वंâठ-समान श्याम तन क्रोध जलंता,
रक्तनयन पुंâकार मार विषकण उगलंता।
फण को ऊँचौ करै वेग ही सन्मुख धाया,
तब जन होय निशंक देखि फणिपति को आया।।
जो चापे निज पग तलैं, व्यापै विष न लगार।
नाग-दमनि तुम नाम की, है जिनके आधार।।

ॐ ह्रीं रक्तनयन सर्प जिननामनागदमन्यौषधये समस्तभय- विनाशकाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।४१।।


वल्गत्तुरंग - गज - गर्जित - भीम - नाद-
माजौ बलं बलवतामपि भू-पतीनाम्।
उद्यद्-दिवाकर-मयूख-शिखा-पविद्धं,
त्वत्कीत्र्तनात्-तम इवाशु भिदा-मुपैति।।४२।।
जिस रनमाहिं भयानक शब्द कर रहे तुरंगम,
घन से गज गरजाहिं मत्त मानो गिरि जंगम।
अति कोलाहल मांहि बात जस नांहि सुनीजै,
राजन को परचण्ड देखि बल धीरज छीनै।।
नाथ तिहारे नामतै, अघ छिनमाहिं पलाय।
ज्यों दिनकर परकाशतै, अंधकार विनशाय।।

ॐ ह्रीं महासंग्रामभयविनाशकाय सर्वांगरक्षणकराय श्रीप्रथम-जिनेन्द्राय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।४२।।


कुन्ताग्र-भिन्न-गज-शोणित-वारिवाह-
वेगावतार-तरणातुर-योध-भीमे।
युद्धे जयं विजित-दुर्जय-जेय-पक्षास्-
त्वत्-पाद-पंकज-वना-श्रयिणो लभन्ते।।४३।।
मारे जहाँ गयन्द, कुम्भ हथियार विदारे,
उमगे रुधिर प्रवाह वेग जलसम विस्तारे।
होंय तिरन असमर्थ महाजोधा बलपूरे,
तिस रन में जिन तीर भक्त जे हैं नर सूरे।।
दुर्जन अरि कुल जीत के, जय पावैं निकलंक।
तुम पद पंकज मन बसें, ते नर सदा निशंक।।

ॐ ह्रीं महारिपुयुद्धे जय-विजयप्राप्तकाय श्रीआदिवृषभेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।४३।।


अम्भो-निधौ क्षुभित-भीषण-नक्र-चक्र-
पाठीन-पीठ-भय-दोल्वण-वाडवाग्नौ।
रंगत्तरंग-शिखर-स्थित-यान-पात्रास्-
त्रासं विहाय भवत: स्मरणाद्-व्रजन्ति।।४४।।
नक्र चक्र मगरादि, मच्छ करि भय उपजावै।
जामें वड़वा अग्नि, दाहतें नीर जलावै।
पार न पावैं जास, थाह नहिं लहिए जाकी,
गरजे अति गम्भीर लहर की गिनति न ताकी।।
सुखसों तिरैं समुद्र को, जे तुम गुण सुमराहिं।
लोल कलोलन के शिखर, पार यान ले जाहिं।।

ॐ ह्रीं महासमुद्रचलितवात महादुर्जयभयविनाशकाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।४४।।


उद्भूत-भीषण-जलोदर-भार-भुग्ना:,
शोच्यां दशा-मुपगताश्च्युत-जीविताशा:।
त्वत्पाद - पंकज - रजोमृतदिग्ध - देहा:,
मत्र्या भवन्ति मकर-ध्वज-तुल्य-रूपा:।।४५।।
महा जलोदर रोग, भार पीड़ित नर जे हैं,
वात, पित्त, कफ, कुष्ट आदि जो रोग गहे हैं।
सोचत रहें उदास, नाहिं जीवन की आशा,
अति घिनावनी देह, धरें दुर्गन्ध निवासा।
तुम पद पंकज धूल को, जो लावै निज अंग।
ते नीरोग शरीर लहि, छिनमें होंय अनंग।।

ॐ ह्रीं दशताप-जलंधराष्टदश-कुष्टसन्निपातमहारोगविनाशकाय परमकामदेवरूपलक्ष्मीदायकादि जिनेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।४५।।


आपाद-कण्ठ-मुरुश्रृंखल-वेष्टितांगा,
गाढं बृहन्निगड-कोटि-निघृष्ट-जंघा:।
त्वन्नाम-मन्त्र मनिशं मनुजा: स्मरन्त:
सद्य: स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति।।४६।।
पांव वंâठतैं जकर बांध सांकल अतिभारी,
गाढ़ी बेड़ी पैर मांहि जिन जांघ विदारी।
भूख, प्यास, चिन्ता शरीर दुख जे विललाने,
शरण नांहि जिन कोय भूप के बन्दीखाने।।
तुम सुमरत स्वयमेव ही, बंधन सब कट जािंह।
छिनमें ते सम्पति लहैं, चिंता भय विनसाहिं।।

ॐ ह्रीं महाबंधन आपादवंâठपर्यन्त बैरीकृतोपद्रवभयविघाताय श्री आदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।४६।।


मत्त - द्विपेन्द्र - मृगराज - दवानलाहि-
संग्राम-वारिधि-महोदर-बन्धनोत्थम्।
तस्याशु नाश-मुपयाति भयं भियेव,
यस्ताववंâ स्तव-मिमं मतिमान-धीते।।४७।।
महामत्त गजराज और मृगराज दवानल,
फणपति रण परचण्ड नीरनिधि रोग महाबल।
बंधन ये भय आठ डरपकर मानों नाशैं,
तुम सुमरत छिनमाहिं अभय थानक परकाशैं।।
इस अपार संसार में, शरन नािंह प्रभु कोय।
तातैं तुम पद-भक्त को, भक्ति सहायी होय।।

ॐ ह्रीं सिंह-गजेन्द्रराक्षसभूतपिशाचशाकिनीरिपु परमोपद्रवविनाशकाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।४७।।


स्तोत्र-स्रजं तव जिनेन्द्र गुणैर्-निबद्धां
भक्त्या मया विविध-वर्ण-विचित्र-पुष्पां।
धत्ते जनो य इह कण्ठ-गतामजस्रं-
तं मानतुंगमवशा समुपैति लक्ष्मी:।।४८।।
यह गुणमाल विशाल, नाथ तुम गुणन संवारी,
विविध वर्णमय पुहुप गूंथ मैं भक्ति विथारी।
जो नर पहिरैं कण्ठ भावना मन में भावें,
मानतुंग ते निजाधीन शिवलक्ष्मी पावें।।
भाषा भक्तामर कियो, ‘‘हेमराज’’ हित-हेत। जे नर पढ़ें सुभावसोें, ते पावैं शिवखेत।।

ॐ ह्रीं पठन-पाठन श्रोतव्य श्रद्धावनत मानतुंगाचार्यादि समस्तजीव कल्याणदाय श्रीआदिपरमेश्वराय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।।४८।।