श्रीमहावीरजी

दिगम्बर जैन अतिशयक्षेत्र, श्रीमहावीरजी राजस्थान के सवाईमाधोपुर जिले में दिल्ली-मुम्बई हाइवे पर रेलवे स्टेशन से छह कि.मी. की दूरी पर अवस्थित है। तीर्थ के एकदम निकट गम्भीर नदी बहती है। यहाँ भगवान महावीर की अतिशय सम्पन्न जिस मूर्ति की ख्याति है, वह भूगर्भ से प्राप्त हुई थी। किंवदन्ति है कि एक ग्वाले की गाय जंगल से चरकर जब घर लौटती तो उसके थन दूध से खाली हो जाते। एक दिन उस ग्वाले ने उस रहस्य को जानना चाहा। पता चला कि गाय एक टीले पर खड़ी है। उसके थनों से दूध स्वतः झर रहा है। ग्वाले को यह घटना एक पहेली की तरह लगी। उसने उस स्थान की खुदाई की तो इस मनोहारी मूर्ति के दर्शन हुए। बस फिर क्या था, जैन समाज के प्रमुख लोगों की वहाँ भीड़ लग गयी। पश्चात् समारोहपूर्वक मूर्ति को लाकर मन्दिर में विराजमान कर दिया गया। लोग अतिशयों से आकर्षित होकर दर्शनार्थ आने लगे और धीरे धीरे यह स्थान विशाल तीर्थ बन गया। आज राजस्थान का यह सबसे प्रसिद्ध तीर्थ है।

भगवान महावीर की इस मर्ति का शिल्पांकन गप्तकाल के बाद का है। यह ठोस ग्रेनाइट की न होकर रवादार बलुये पाषाण की है। यहाँ यात्रा पर आनेवाले नर-नारियों में अत्यन्त उमंग और अद्भुत स्फुरणा देखी जाती है। अब तो यहाँ एक विशाल मन्दिर का निर्माण हो चुका है, जिसके चारों ओर धर्मशालाएँ हैं। विशाल मानस्तम्भ है। मूल नायक के अलावा मन्दिर में दायें-बायें अनेक देवियाँ हैं। इसी मन्दिर के नीचे के परिसर में क्षेत्र का कार्यालय है और सरस्वती भवन है।

आज इस क्षेत्र का बहुत विस्तार हो चुका है। क्षेत्र पर कई सेवाभावी संस्थाएँ हैं । एक महिला महाविद्यालय भी है।

नदी के उस पार पूर्वी किनारे पर शान्तिवीर नगर है। यहाँ एक विशाल मन्दिर है जिसमें 28 फुट ऊँची शान्तिनाथ की विशाल मूर्ति के अतिरिक्त चौबीस तीर्थंकरों और उनके शासनदेवताओं की मूर्तियाँ विराजमान हैं। एक गुरुकुल भी है।

महावीर जयन्ती के अवसर पर इस अतिशयक्षेत्र पर प्रतिवर्ष एक सप्ताह तक विशाल मेले का आयोजन होता है। दीपावली के अवसर हजारों की संख्या में जैन यात्रियों के साथ-साथ मीणा, गूजर, जाटव आदि भी बहुत बड़ी संख्या में सम्मिलित होते हैं। तिजारा अतिशयक्षेत्र के स्थापनाकाल से पूर्व इस स्थान को 'देहरा' (देवालय) कहा जाता रहा है। अनुश्रुति है कि पहले यहाँ जैन मन्दिरों के खंडहरों का एक बड़ा सा टीला था। सन् 1956 में इस टीले की खुदाई में चन्द्रप्रभ की एक मनोहारी मूर्ति प्रकट हुई, जिसे सर्वप्रथम एक काष्ठ सिंहासन पर विराजमान कर दिया गया। पन्द्रहवीं शती में निर्मित इस मूर्ति के सामने अखंड ज्योति जलाई गयी, जो आज भी प्रज्वलित है।

सच तो यह है कि राजस्थान में चौहान, परमार, सिसोदिया आदि अनेक राजपूत राजवंशों ने राज किया है। इनमें कोई जैन नरेश नहीं था, किन्तु उदयपुर, जोधपुर, जैसलमेर, भरतपुर आदि राज्यों में अमात्य, प्रधान सेनापति एवं कोषाध्यक्ष पदों पर प्रायः जैन नियुक्त किये जाते थे। इसका कारण शायद जैनों की चारित्रिक दृढ़ता और ईमानदारी रही है। जैन आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न रहे हैं। राज्य को आवश्यकता पड़ने पर धन जुटा सकते थे। महाराणा प्रताप ने सेनापति भामाशाह की पूँजी से सेना जुटाकर अपनी मातृभूमि को दुश्मनों से मुक्त कराया था।

महाराष्ट्र में भी अनेक अतिशयक्षेत्र हैं। साथ ही गजपन्था, माँगीतुंगी और कुन्थलगिरि निर्वाणक्षेत्र भी हैं, जहाँ से अनेक वीतरागी मुनिराजों ने तपश्चरण कर मुक्ति प्राप्त की। गुजरात प्रदेश के तीर्थस्थल हैं- तारंगा, सोनगढ़, शत्रुजय, घोघा, पावागढ़, विघ्नहर पार्श्वनाथ, अंकलेश्वर, अमीक्षरो पार्श्वनाथ मुख्य हैं।

चाँदखेड़ी

यह झालावाड़ जिले के खानपुर कस्बे से लगभग तीन फल्ग की दूरी पर रूपली नदी के तट पर अवस्थित है। यहाँ पर भगवान आदिनाथ की बहुत ही कलापूर्ण मूर्ति विराजमान है। यह मूर्ति अनेक चमत्कारों एवं अतिशयों से सम्पन्न है। मुख पर शान्ति और करुणा की निर्मल भावप्रवणता है। सच ही, मूर्ति के दर्शन से भक्तजन को अपार शान्ति मिलती है।

पद्मपुरा

यह क्षेत्र जयपुर से 34 कि.मी. दूर दक्षिण में स्थित है। यहाँ भी खुदाई में श्वेत पाषाण भगवान पद्मप्रभ की एक पद्मासन मूर्ति प्राप्त हुई थी। आज यहाँ एक विशाल मन्दिर है। यह मन्दिर इतना भव्य है कि पूरे राजस्थान में इसकी ख्याति है।

केशोराय पाटन

अतिशयक्षेत्र केशोराय पाटन बूंदी जिले से 43 कि.मी. चम्बल नदी के उत्तर तट पर अवस्थित है। अत्यन्त प्राचीनकाल से ही इस स्थान की तीर्थ के रूप में प्रसिद्धि रही है। यहाँ मुनिसुव्रतनाथ की चमत्कारी मूर्ति विराजमान है। कहा जाता है कि मोहम्मद गोरी राजस्थान विजय के सिलसिले में यहाँ भी पहुंचा था। उसके सैनिकों ने मूर्ति तोड़ने का प्रयास किया, लेकिन असफल रहे।

चित्तौड़ का किला (जैन कीर्तिस्तम्भ)

स्थानीय जनता इस स्तम्भ को 'कीर्तम' कहती है। 75 फुट ऊँचे इस स्तम्भ का व्यास 31 फुट है। ऊपर जाकर यह 15 फुट रह गया है । इतिहासवेत्ताओं के अनुसार यह प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को वि. सं. 952 में अर्पित किया गया था। निश्चय ही शिल्प का यह अनुपम उदाहरण है। इसके चारों कोनों पर आदिनाथ की खडगासन में पाँच फुट अवगाहना वाली दिगम्बर मूर्तियाँ हैं । जयस्तम्भ की अपेक्षा यह प्राचीन है।

ऋषभदेव (केसरियाजी)

राजस्थान के उदयपुर जिले में यह तीर्थ अतिशयक्षेत्र के रूप में विख्यात है। यहाँ ऋषभदेव की साढ़े तीन फुट अवगाहना वाली पद्मासन में काले पाषाण की भव्य मूर्ति विराजमान है। इस मूर्ति के सम्बन्ध में अनेक किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं। भक्तजन यहाँ आकर भगवान के चरणों में केशर चढ़ाते हैं और मनौती मनाते हैं। यहाँ मन्दिर के आसपास कई शिलालेख उत्कीर्ण हैं।

माउंट आबू

आबू पर्वत (दिलवाड़ा, राजस्थान) पर विश्वविख्यात अनेक जैन मन्दिर हैं। सभी के सभी शिल्पकला के अद्भुत नमूने हैं। ये सब सफेद संगमरमर से बने हुए हैं। इनके स्तम्भों, तोरणों और छतों की सूक्ष्म कला दर्शनीय है। इन अद्भुत कला के निर्माता राजमन्त्री विमलशाह (बारहवीं शती) और वास्तुकार तेजपाल रहे हैं। एक दिगम्बर मन्दिर को छोड़कर बाकी सभी श्वेताम्बर मन्दिरों का समूह है।

सोनगढ़

सोनगढ़ गुजरात प्रदेश के भावनगर जिले में स्थित है। वैसे यह कोई तीर्थस्थान नहीं है, लेकिन सन्त कानजीस्वामी के कारण इसका महत्त्व किसी भी तीर्थ से कम नहीं है। वर्तमान में यहाँ सीमन्धरस्वामी दिगम्बर जैन मन्दिर, मानस्तम्भ, समवसरण मन्दिर, परमागम मन्दिर, नन्दीश्वर मन्दिर, कुन्दकुन्द प्रवचनमंडप, स्वाध्याय मन्दिर आदि अनेक आयतनों का निर्माण हो चुका है।

गुजरात की तरह महाराष्ट्र में भी कुछेक निर्माणभूमियों के अतिरिक्त अनेक गुहा मन्दिर हैं। गजपन्था निर्वाणभूमि है। यहाँ से सात बलभद्र और आठ कोटि मुनि यादव मुक्त हुए। पुरातत्त्व की दृष्टि से इसका सर्वाधिक महत्त्व है। एक अन्य निर्वाणस्थली हैमाँगीतुंगी। यहाँ से राम, हनुमान, सुग्रीव आदि निन्यानबे कोटि मुनिराजों को तपस्या करके मुक्ति पायी। दरअसल माँगी और तुंगी एक ही पर्वत के दो शिखर हैं, जो एक-दूसरे से मिले हुए हैं। कहा जाता है कि निकट प्राचीन काल में यह एक बहुत बड़ा नगर था जो 'मूलहेड़' नाम से जाना जाता था।

माँगी शिखर पर एक गुहा है, जिसमें मूलनायक महावीर की तीन फुट अवगाहना वाली श्वेत पदमासन मर्ति विराजमान है। तंगी शिखर पर भी एक गफा है जहाँ रामचन्द्र, नील, गवाक्ष आदि की वीतरागी मुनिअवस्था की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं । तलहटी में भी तीन जैन मन्दिर हैं।

चाँदवड़ का गुहा मन्दिर

यह चन्द्रनाथ दिगम्बर जैन गुफा के नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें अनेक जैन मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। कलिकुंड पार्श्वनाथ— यह महाराष्ट्र के साँगली जिले में अवस्थित है। इसका प्राचीन नाम कौंडिन्यपुर है। प्राचीन काल में यह करहाटक शासन के अन्तर्गत था। मान्यता है कि करहाटक एक समय शास्त्र विद्या और शस्त्र विद्या का विश्वविद्यालय था। कुम्भोज बाहुबली- यह कोल्हापुर जिले में है। महामुनि बाहुबली के नाम से पूरे क्षेत्र में इसकी प्रसिद्धि है। यहाँ बाहुबली स्वामी की अट्ठाइस फुट ऊँची श्वेत मकराना पाषाण की भव्य खडगासन मूर्ति है। यहाँ एक प्रसिद्ध जैन गुरुकुल मन्दिर है जिसमें बड़े विद्वान और आस्थावान त्यागी रहे हैं। इस महाविद्यालय ने अनेक परम्परागत विद्वान जैन समाज को दिए हैं। कुन्थलगिरि– यह सिद्धक्षेत्र है। यहाँ से कुलभूषण और देशभूषण मुनिराजों ने निर्वाण प्राप्त किया। कुलभूषण और देशभूषण नाम से एक मन्दिर भी है। दोनों मुनिराजों के वहाँ चरणचिह्न हैं। आचार्य शान्तिसागर महाराज का समाधिमरण इसी क्षेत्र पर हुआ था। धाराशिव की गुफाएँ- धाराशिव की गुफाएँ 'लयण' कहलाती हैं। ये उस्मानाबाद शहर के निकट हैं। इन गुफा-मन्दिरों का इतिहास बहुत प्राचीन है। हरिषेण कथाकोश' में इन गुफाओं का विस्तार से वर्णन है।

एलोरा के गुफा-मन्दिर

औरंगाबाद से पश्चिम के तीस किलोमीटर दूर पर अवस्थित जगत-विख्यात गुहा मन्दिर हैं। इनकी संख्या चौतीस है। तीस से चौतीस नम्बर की गुफाएँ जैनधर्म से सम्बन्धित हैं। शेष का सम्बन्ध बौद्धधर्म से है। एलोरा अपने शिल्प-वैभव और स्थापत्य कला की दृष्टि से अद्वितीय है। यहाँ पार्श्वनाथ और बाहुबली की मूर्तियों की कला का वैविध्य दिखाई देता है। शासन देवी-देवताओं में चक्रेश्वरी, पद्मावती, अम्बिका, सिद्धार्यिका तथा गोमेद, मातंग और धरणेन्द्र की मूर्तियाँ विशेष उल्लेखनीय हैं।

कलाक्षेत्र में कर्नाटक के तीर्थों के सन्दर्भ में अपनी दृष्टि को कहीं अधिक विस्तार देना होगा। दरअसल यहाँ श्रद्धा और भक्ति, कला और स्थापत्य के माध्यम से साकार की है। गोम्मटेश्वर बाहुबली के प्रति भक्ति को कला-मर्मज्ञों ने पर्वत-खंड में जो मनमोहक रूप दिया है, वह अपने आप में अद्वितीय है।

आचार्य भद्रबाहु स्वामी, आचार्य कुन्दकुन्द, सिद्धान्तचक्रवर्ती आचार्य नेमिचन्द्र, वीरमार्तण्ड चामुंडराय, महिमामयी काललदेवी, कूशमांडिनी, महादेवी शान्तला इन सबके आख्यानों ने यहाँ के मन्दिरों, शिलालेखों, मानस्तम्भों और भित्तिचित्रों में अपना इतिहास प्रतिष्ठापित किया है। इन मूर्तियों और मन्दिरों के पीछे जो कई-कई विचित्र घटनाएँ हुई हैं, उससे ये कलाक्षेत्र मात्र कला के क्षेत्र न रह कर अतिशयक्षेत्र बन गये हैं। कर्नाटक के ये स्थान, जिन्हें तीर्थ-वन्दना में शामिल किया जाता है, उनमें- श्रवणबेलगोल, वेल्लूर, धर्मस्थल, वेणूर, मूडबिद्रि, कारकल, बारांग, कुन्दकुन्दवेट्ट (कुन्दाद्रिगिरि), हुमचा सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं।

श्रवणबेलगोल

सम्पूर्ण भारत में सबसे अधिक विख्यात परम पावन जैन तीर्थ है। कला-इतिहास और अतिशय-सम्पन्नता के कारण इसकी महिमा अन्य तीर्थों की तलना में कहीं अधिक है। यह कर्नाटक के हासन जिले में बैंगलोर से एक सौ चालीस कि.मी. दूर स्थित है। प्राचीन समय में यह जैन साधुओं (श्रमणों) की तपोभूमि रही है। ऐसा कहा जाता है कि अन्तिम श्रुतकेवली भद्रबाहु के साथ सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने दिगम्बर अवस्था धारण कर यहाँ एक पहाड़ी पर तपस्या की थी। यहाँ भद्रबाहु के चरण-चिह्न स्थापित हैं। साथ ही सम्राट चन्द्रगुप्त की स्मृति में एक जिन-मन्दिर (चन्द्रगुप्त वसदि) और चित्रावली भी है। इस पहाड़ का नाम ही चन्द्रगिरि पड़ गया है। यहाँ इस पहाड़ पर और इस नगर के आसपास इतिहास के साक्षी लगभग पाँच सौ शिलालेख हैं। इसी पर्वत पर और भी कई प्राचीन वसदियाँ हैं, जिनमें शान्तिनाथ बसदि, शासन बसदि, चन्द्रप्रभ बसदि, सवतिगन्धवारण बसदि और चामुंडराय बसदि प्रमुख हैं। पर्वत के उत्तर द्वार से नीचे उतरने पर जिननाथपुर के मन्दिर के दर्शन होते हैं। यह होयसल चित्रकारी का अद्भुत नमूना है।

दूसरा पर्वत विन्ध्यगिरि है। इन दोनों के बीच कल्याणी सरोवर है। विन्ध्यगिरि, जहाँ पर बाहुबली की उत्तुंग मूर्ति है, पर जाने के लिए पाँच सौ सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। बाहुबली के अतिरिक्त इस पर्वत पर ब्रह्मदेव मन्दिर, चेन्नण्ण वसदि, ओदेगल वसदि आदि अनेक मन्दिर हैं। ऊपर पहुँचने पर एक समतल घेरे में गोम्मटेश्वर बाहुबली की मनोज्ञ मूर्ति है। पास ही द्वार पर गुल्लिकाअज्जी की मूर्ति है। लोकश्रुति है कि बाहुबली मूर्ति की प्रतिष्ठा के अवसर पर मूर्ति निर्माता चामुंडराय ने हर्षित होकर जब अभिषेक किया तो दुग्ध की धारा सत्तावन फुट उत्तुंग इस मूर्ति की कमर के नीचे नहीं जा रही थी। कारण था, चामुंडराय का अपनी इस निर्मिति पर उत्पन्न अहं भाव। गुल्लिकाअजी ने उनका अहंकार दूर कर विनय-पाठ पढ़ाया था। यह अज्जी और कोई नहीं, क्षेत्र की देवी कूशमांडिनी ही थी, जो गरीब वृद्धा भक्तिन बनकर आई थी और अभिषेक सम्पन्न किया था।

क्षेत्र पर गाँव में कई दर्शनीय बसदियाँ हैं। इनमें भंडारी बसदि नाम से सबसे बड़ा मन्दिर है। इसके अतिरिक्त अक्कन बसदि, मंगायि बसदि, सिद्धान्त बसदि आदि अनेक जिनालय हैं। यहीं भट्टारक चारुकीर्ति स्वामी का निवास स्थान जैन मठ है।

1981 में बाहुबली सहस्राब्दी महामस्तिकाभिषेक से अब तक इस क्षेत्र का बहुत विकास हुआ है। अनेक धर्मशालाएँ और विश्रामगृह के अतिरिक्त क्षेत्र की ओर से संचालित प्राकृत विद्या संस्थान एवं इंजीनियरिंग कॉलेज भी है।

तमिलनाडु में भी अद्भुत पुरावैभव के दर्शन होते हैं। वहाँ सारे प्रदेश में जिनमन्दिर, मूर्तियाँ, शिलालेख, गुहामन्दिर और उनमें उत्कीर्ण जैन मूर्तियाँ, चट्टानों में उत्कीर्ण मूर्तियाँ, अष्टधातु मूर्तियाँ, चूने की विशाल तीर्थंकर मूर्तियाँ, सरस्वती मूर्तियाँ, कलापूर्ण मानस्तम्भ, विशाल गोपर, रथ तथा दीपमालिकाएँ— सभी कछ वहाँ के धार्मिक और सांस्कतिक वैभव को दर्शाते हैं। पिछले दिनों यहाँ के अनेक जैन मन्दिरों का जीर्णोद्धार हुआ है।

यहाँ के प्रमुख क्षेत्र- कांचीपुरम (कांजीवरम), चितंबूर (सित्तामूर), जिनपुरम, पोन्नूर तिरुमलई, स्तवनिधि, आरपक्कम, करन्दै, जिनकांची, सालुक्कई, वेलकुम, उपवेलूर, थिरुप्परुथिकुण्डम हैं।

करन्दै

इस क्षेत्र की प्रसिद्धि 'मुनिगिरि' या 'अकलंकदेव बस्ती' के नाम से भी है। अकलंकदेव स्वामी का समाधिस्थल भी यहीं पर है। कहा जाता है कि अकलंकदेव के साथ शास्त्रार्थ में बौद्धों की पराजय यहीं पर हुई थी। यहाँ एक परकोटे के भीतर छहः मन्दिर हैं। इस क्षेत्र पर अठारह शिलालेख भी मिलते हैं। एक जैन तीर्थ है पोन्नूर तिरुमलई। यह आचार्य कुन्दकुन्द की तपोस्थली 'नीलगिरि' के नाम से जानी जाती है। कुन्दकुन्द स्वामी के चरणचिह्न भी बने हुए हैं। पास ही एक सुन्दर गुफा है। आरपक्कम में तीर्थंकर आदिनाथ का हजार वर्ष पुराना मन्दिर है, जो तमिलनाडु के कुलदेवता के रूप में जाना जाता है। दीप-मालिका, धातु की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएँ, अष्टप्रातिहार्य और पंचमेरु दर्शनीय हैं। यहीं पास में एक स्थान है वेन्कुड्रम। यहाँ काले और सफेद पाषाण की लगभग दो हजार वर्ष पुरानी मूर्तियाँ हैं । वेलुक्कम में आदिनाथ का एक विशाल मन्दिर है। यहाँ पर स्थित स्वर्णरथ के कारण इस क्षेत्र की प्रसिद्धि है। इस अद्भुत रथ के निर्माण में चार सौ किलो ताँबा और डेढ़ किलो सोना लगा है।

तमिलनाडु का सबसे अधिक ख्यात तीर्थस्थल है, तो वह है मेलसित्तामूर। यह जैन काँचीमठ के नाम से भी जाना जाता है। परकोटे के भीतर 68 खम्बों वाला एक विशाल मन्दिर है। जिसमें सभी तीर्थंकरों के अतिरिक्त यक्ष-यक्षिणी तथा अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ उत्र्कीण हैं। चूने की एक सफेद रंग की मूर्ति विशेष दर्शनीय है।

एक क्षेत्र अरहंतगिरि नवीन तीर्थ के रूप में विकसित हो रहा है। पार्श्वनाथ मन्दिर के अलावा यहाँ पंचदेवियों- ज्वालामालिनी, कुष्मांडिनी, पद्मावती, वराहदेवी और चक्रेश्वरी का मन्दिर अपनी विशेषता लिये हुए है।

तीर्थ क्षेत्रों पर जीर्णोद्धार, नव-निर्माण, विकास और विस्तार दिन-प्रतिदिन हो रहे हैं। जैन समाज इस कार्य में तन-मन-धन से सहयोग कर रही है। दरअसल इस पुनीत कार्य में प्रेरणास्रोत हैं हमारे मुनिराज। वे विहार करते हुए जिस क्षेत्र पर पहुँचते हैं वहाँ बहुत कुछ नव-निर्माण हो जाता है। नये-नये भव्य मन्दिर, विशाल धर्मशालाएँ, सभा-भवन जगह-जगह बन चुके हैं, बनते जा रहे हैं। बीसवीं शती में ये निर्माण बहुत बड़ी मात्रा में बहुत तेजी से हुए हैं।