।। पंचमहाकल्याणक ।।

उसके आग कल्पभूमि होती है। कल्पभूमि में कल्पवृक्षों का वन रहता हैं इन वनों में कल्पनातीत शोभावाले दश प्रकार के कल्पवृक्ष होते हैं, जो कि नाना प्रकार की लता-बल्लियों एवं वापिकाओं से वेष्टित रहते हैं। यहां देव विद्याधर ओर मनुष्य क्रीड़ारत रहते हैं। कल्पभूमि के पूर्वादिक चारों दिशाओं में क्रमशः नमेरू, मन्दार, सन्तानक और पारिजात नामक चार सिद्धार्थ वृक्ष होते हैं। सिद्धार्थ वृक्षों की शोभा चैत्य वृक्षों के सदृश होती है, किंतु इनमें अर्हंत की जगह सिद्ध प्रतिमाएं होती हैं।

कल्पभूमि के आगे पुन‘ एक स्वर्णमय वेदी बनी रहती है। इस वेदी के द्वार पर भवनवासी देव द्वारपाल के रूप में खड़े रहते हैं। इस वेदी के आगे भवन-भूमि होती है। भवनभूमि में एक से एक सुन्दर कलात्मक और आकर्षक बहुमंजिले भवनों की पंक्ति रहती हैं देवों द्वारा निर्मित इन भवनों में सुर-मिथुन गीत, संगीत, नृत्य, जिनाभिषेक, जिनस्तवन आदि करते हुए सुखपूर्वक रहते हैं। भवनों की पंक्तियों के मध्य वीथियां-गलियां बनी होती हैं। वीथियों के दोनों पाश्र्व में नव-नव स्तूप (कुल 72) बने होते हैं। पद्मराग मणिमय इन स्तूपों में अर्हनत और सिद्धों की प्रतिमाएं विराजमान रहती हैं। इन स्तूपों पर वन्दन-मालाएं लटकी होती हैं। मकराकार तोरणद्वार होते हैं। छत्र लगे होते हैं, मंगल द्रव्य रखे होते हैं, ओर ध्वजाएं फहराती रहती हैं। यहां विराजमान जिन-प्रतिमाओं की देवगण पूजन और अभिषेक करते हैं।

भवनभूमि के आगे स्फटिक मणिमय चतुर्थ कोट आता हैं इस कोट के गोपुर द्वारों पर कल्पवासी देव खड़े रहते हैं।

द्वादश-गण

चतुर्थ कोट के आगे रत्न-स्तम्भों पर आधारित अंतिम श्रीमण्डप भूमि होती है। इस भूमि में स्फटिक मणिमय सोलह दीवारों से विभाजित बारह कोठे होते हैं। इन बाहर कोठों में ही बारह गण अथवा बारह सभाएं होती हैं। इनमें सर्वप्रथम अर्हंत भगवान के दांय ओर के कोठे में गणधर देवादिक मुनि विराजते हैं। द्वितीय कोठे में कल्पवासिनी देवियां होती हैं, तीसरे कक्ष में आर्यिका व श्राविका समूह होता है। इसके आगे वीथि रहती है। वीथि के आगे चैथे, पांचवें और छठवें कोठे में क्रमशः ज्योतिषी, व्यन्तर और भवनवासी देवों की देवियां रहती हैं। उसके आगे पुनः विथि आ जाती है। उसके आगे के तीन कोठों में क्रमशः व्यंतर, जोतिष और भवनवासी देव रहते हैं। इसके बाद तीसरी वीथि होती है। उसके आगे के तीन कोठों में क्रमशः कल्पवासी देव, चक्रवर्ती आदिक मनुष्य एवं सिंहादिक पशु-पक्षी जन्म-जात बैर को छोड़कर उपशांत भाव से बैठकर भगवान के उपदेशामृत का लाभ लेते हैं।

इन कोठों में मिथ्यादृष्टि, अभव्य और असंज्ञी जीव कदापि नहीं होते। ऐसे जीव बाहर के ही रागरंग में उलण्कर रह जाते हैं। उसके आगे स्फटिक मणिमय पांचवी वेदी आती है। इस वेदी के आगे एक के ऊपर एक क्रमशः तीन पीठ होते हैं प्रथम पीठ पर बारह कोठों और चार वीथियों के सम्मुख सोलह-सोलह सीढि़यां होती हैं। इस पीछे पर चारों दिशाओं में अपने मस्तक पर धर्मचक्र धारण किये चार यक्षेन्द्र खड़े रहे हैं। इसी पीठ के ऊपर द्वितीय पीठ होता हैं इस पीठ पर सिंह , बैल आदि चिन्हों वाली ध्वजाओं की पंक्ति, अष्ट मंगल द्रव्य, नव-निधि व धूपघट आदि शोभायमान रहते हैं। द्वितीय पीठ के ऊपरी तीसरी होती हैं तीसरी पीठ के ऊपर अनेक ध्वजाओं से युक्त गंधकुटी होती है। गन्धकुटी के मध्य में पाइ-पीठ सहित सिंहासन होता है। भगवान सिंहासन से चार अंगुल ऊपर अष्ट महाप्रातिहायों के साथ आकाश में विराजमान रहते हैं।

समवशरण का माहात्म्य- समवशरण में जिनेन्द्र देव के माहात्म्य से आतंक, रोग, मरण, उत्पत्ति, बैर, काम-बाधा एवं क्षुधा-तृषा की पीड़ाएं कदापि नहीं होती। साथ ही श्रीमण्डपभूमि के थोड़े से ही क्षेत्र में असंख्य जीव एक दूसरे से अस्पृष्ट रहते हुए सुखपूर्वक विराजते हैं। योजनों विस्तारवाले इस समवशरण में प्रवेश और निकलने में बाल-वृद्ध सभी को अन्तर्मुर्हूत से अधिक समय नहीं लगता है।