।। पूजापाठ ।।
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मंत्र द्वारा रिष्टारिष्ट का अनुमान-

दिगम्बर जैन आचार्यों की परम्परा में निमित्तज्ञानशिरोमणि श्री १०८ भद्रबाहु आचार्य से भी परिचित हैं। जिन्हें उच्च कोटि का निमित्त ज्ञान प्राप्त था और जो महामंत्रवादी थे। उनके निमित्त के बारे में शास्त्रों में उल्लेखित है कि उज्जैनी नगर के अन्तर्गत उत्तर भारत में श्री भद्रबाहु स्वामी २४००० शिष्यों के साथ विराजमान थे। एक रोज आहार को जाते हुए एक स्थान पर बाहर फणों का विशाल सर्प मिला और वह फन उठाकर आगे बढ़ने से रोकने लगा, तो आचार्य भद्रबाहु स्वामी आगे बढ़े। फिर क्या देखते है कि एक घर में बालक पालने में झूलते हुए बोलने लगा कि ‘‘तुम यहाँ से जाओ जाओ’’ इस निमित्त से भद्रबाहु स्वामी ने समझा था कि अब आने वाले समय में उत्तर भारत में १२ वर्ष का अकाल पड़ने वाला है इसलिए वे बिना आहार लिये ही लौट गये। ऐसे महान निमित्तज्ञानी भद्रबाहु आचार्य द्वारा कही गयी ‘भद्रबाहु संहिता’ में रोगी के जीवनकाल का समय जानने के लिए मंत्र साधनापूर्वक विधि बतलाई है। उसमें लिखा है कि-

अभिमन्त्रस्तत्र तनु: तच्चरणैर्मापयेच्च सन्हायायाम्। अपि ते पुन: प्रभाते सूत्रे न्यूने हि मासमायुष्कम् ।।

मंत्र प्रयोग की आज्ञा-

सम्यग्दर्शन के आठ अंगों में एक प्रभावना नाम का अंग है जो कि सम्यग्दृष्टि का एक मुख्य अंग है। अब यह ध्यान देना है कि सम्यग्दृष्टि गृहस्थ ही होगा ? क्या साधु नहीं हो सकता ? वास्तव में अगर देखा जाय तो साधु ही सम्यग्दृष्टि है, अभी गृहस्थ के सम्यग्दर्शन की वास्तविकता का कोई पता ठिकाना ही नहीं है क्योंकि हमने जो दिगम्बर जैन हैं और यंत्र, मंत्र का निषेध करते हैं, उन्हें अन्य मिथ्यादृष्टि देवी-देवताओं के देवालय पर माथा टेकते देखा है इसलिए आज वर्तमान में तो जिनशासन की प्रभावना अन्य किसी के द्वारा नहीं हो सकती है इसलिए प्रभावना हेतु अमृतचन्द्र आचार्य और समन्तभद्र आचार्य ने कहा है कि रत्नत्रय के द्वारा ही आत्मा की प्रभावना करनी चाहिए। जिनागम में उदाहरण है कि मथुरा के राजा पूतिगंध की रानी उर्विला ने जब देखा कि आष्टान्हिक पर्व में बुद्धदासी का रथ पहले निकलेगा। उसने उपवास की प्रतिज्ञा करके क्षत्रिय गुफा में रहने वाले सोमदत्त और वज्रकुमार मुनि के पास जाकर प्रार्थना की। तभी मुनि वन्दना हेतु दिवाकरदेव आदि बहुत से विद्याधर (जिनके यहाँ वज्रकुमार का पालन हुआ था) आये। वज्रकुमार मुनि ने उनसे कहा कि आप लोग विद्या के बल से उर्विला रानी की इच्छानुसार जिनेन्द्रदेव का रथ पहले निकालिये, इन लोगों ने वैसा ही किया जिससे कि आज तक प्रभावना अंग में वज्रकुमार मुनि की प्रसिद्धि हो रही है।

मंत्र व्यवस्था-

मंत्र के तीन अंग होते हैं:

(१) रूप (मंत्र की ध्वनियों का सन्निवेश),

(२) बीज (मंत्र की ध्वनियों में निहित शक्ति) और

(३) फल (मंत्र के द्वारा होने वाली किसी वस्तु की प्राप्ति)

उपरोक्त जानकारी के साथ मंत्र साधना की विधि भी आचार्यों ने बतलाई है।सबसे पहले जिस मंत्र की साधना करना है उस मंत्र के अक्षरों की तिगुना करके अपने नाम के अक्षरों को उनमें जोड़ देवे। फिर उसमें १२ का भाग देवें । फल निम्न प्रकार समझे-५ या ६ बचे तो मंत्र सिद्ध होगा, ९ या १० बचे तो देर से सिद्ध होगा, ७ या ११ बचे तो भी ठीक है, ८ या शून्य (०) बचे तो मंत्र सिद्ध नहीं होगा। यदि मंत्र सिद्ध करना ही है तो ‘ह्रीं, श्रीं, क्लीं’ इन तीन बीजाक्षरों में से किसी को भी मंत्र में यथास्थान सम्मिलित करने से सब दोष दूर हो जाते हैं तथा नियम से मंत्र सिद्ध हो जाता है। मंत्र शास्त्र में मंत्र लिखा है फिर भी मंत्र विधि जानने वालेसे उसके विषय में आवश्य पूछना चाहिए।। मंत्र साधना के समय शुद्ध घृत का दीपक रहे। साथ ही अगरबत्ती भी जलती रहे । मंत्र साधना के प्रारम्भ में सकलीकरण करने का विधान है। निर्विध्न इष्ट कार्य की सिद्धि के लिए अपनी रक्षा हेतु जो विविध मंत्रों के रूप में सम्यग्दृष्टि देवों का स्मरण कर दिशा बन्धन आदि किया जाता है, उसे सकलीकरण कहते है। मंत्र सिद्धि के प्रथम दिन पंचोपचारी पूजा भी करनी चाहिए। आह्वानन, स्थापन, सन्निधिकरण, पूजन और विसर्जन की विधिपूर्वक की गई पूजन पंचोपचारी कहलाती है। पूरक से आह्वानन, रेचक से विसर्जन और शेष के कर्म कुम्भक प्राणायाम से करने चाहिए। जप की संख्या एक बार में कम से कम १०८ होनी चाहिए। फिर प्रतिदिन संकल्पानुसार ४, ३, २ या १ माला प्रात:, मध्यान्ह और अद्र्धरात्रि अवश्य करें। संकल्पानुसार जाप्य पूर्ण होने पर हवन व पूजन क्रिया की जावे । हवन में अन्य विधि के साथ इस बात का विशेष ध्यान रखा जावे कि जिस मंत्र की आराधना की गई है उसी मंत्र की दशांश आहुति दी जावे।

मंत्र की साधना के लिए जाप तीन प्रकास से किया जाता है-

१.वाचक- जाप में शब्दों का उच्चारण किया जाता है अर्थात् मंत्र को बोल-बोलकर जाप किया जाता है।

२. उपांशु- इसमें भीतर से शब्दोच्चारण की क्रिया होती है पर कण्ठ स्थान पर मंत्र के शब्द गूँजते रहते है। मुख से नहीं निकल पाते। इस विधि में शब्दोच्चारण की क्रिया के लिए बाहरी और भीतरी प्रयत्न किया जाता है।

३.मानस- जाप में बाहरी और भीतरी शब्दोच्चारण का प्रयास रूक जाता है। हृदय में मात्र इष्ट का ही चिन्तन होता रहता है।

उक्त तीन प्रकार के जाप क्रमश: जघन्य, मध्यम और उत्तम हैं। साधक जिससे भी चाहे जाप कर सकता है। जो विशेषकर स्वात्मा के कल्याण के लिए णमोकारादि मंत्रों का जाप करना चाहता है उसे निम्न आठ प्रकार की शुद्धियों का ध्यान रखना आवश्यक है:-

(१) द्रव्यशुद्धि- पाँचों इन्द्रियों तथ मन को वश कर, कषाय और परिग्रह का यथाशक्ति त्याग करके दयालुचित हो जाप करना।जाप करने वाले को यथाशक्ति अपने अन्तरंग के काम, क्रोध, लोभ, मोह, मान, माया आदि विकारों को दूर कर ही जाप करना आवश्यक है। यहाँ द्रव्यशुद्धि का अभिप्राय साधक की अंतरंग शुद्धि से है।

(२) क्षेत्र शुद्धि- निराकुल स्थान जहाँ शोरगुल न हो तथा डांस, मच्छर आदि बाधक जन्तु न हो ‘मन में क्षेभ’ उत्पन्न करने वाले उपद्रव एवं अधिक शीत, उष्ण की बाधा श्न हो, एकान्त निर्जन स्थान जाप करने के लिये श्रेष्ठ है।घर के किसी एकान्त स्थान में जहाँ पूर्ण शान्ति रह सके वहाँ पर जाप किया जा सकता है।

(३) समय शुद्धि- प्रात: मध्यान्ह, संध्या और अद्र्धरात्रि के समय २,४ और ६ घड़ी तक जाप करना चाहिए। एक घड़ी २४ मिनट की मानी गई है।

(४) आसन शुद्धि- मौनपूर्वक काष्ठ, शिला, भूमि, चटाई या शीतल पट्टी पर पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पद्मासन, खड्गासन या अद्र्धपद्मासन से क्षेत्र तथा काल का प्रमाण करके जाप करना।

(५) विनय शुद्धि- जाप करनके के लिए नम्रतापूर्वक भीतर का अनुराग उत्साह रखना तथा जिस आसन पर जाप करना हो उस आसन को सावधानीपूर्वक साफ करना।

(६) मन: शुद्धि- मन की चचंलता व विचारों की गन्दगी का त्याग कर जाप करना।

(७) वचन शुद्धि- मंत्र के उच्चारण में अशुद्धि न होना एवं यथासम्भव उच्चारण मन में ही करना तथा धीरे-धीरे साम्य भावपूर्वक मंत्र का जाप करना।

(८) काय शुद्धि- शौचादि शंकाओं से निवृत्त होकर सावधानीपूर्वक स्नानादि द्वारा शरीर शुद्ध करके हलन चलन क्रिया रहित हो जाप करना।

शास्त्रों में जाप करने की तीन विधियाँ निम्न प्रकार हैं, उनका ज्ञान होना आवश्यक है-

(१) कमल जाप- अपने हृदय में आठा पाँखुड़ी के श्वेत कमल का विचार करें। फिर उसकी प्रत्येक पाँखुड़ी पर पीतवर्ण १२/१२ बिन्दुओं की कल्पना करें तथा मध्य के गोलवृत (कणर्का) में बारह बिन्दुओं का चिन्तवन करें। इन १०८ बिन्दुओं पर क्रमश: मंत्र का जाप करना चाहिए।

(२) हस्तांगुलि जाप- दाहिने हाथ की मध्यमा (बीच की ) अँगुली के बीच के पोरुये पर मंत्र को पूरा पढ़े फिर उसी अँगुली के ऊपर पोरूये पर फिर तर्जनी (अंगूठे के पास) अँगुली के ऊपरी पौरुये पर मंत्र पढ़े फिर उसी अँगुली के बीच के पोरुये पर फिर नीचे के पोरुये पर मंत्र पढ़े। तत्पश्चात् बीच की अँगुली के निचले पोरुये पर मंत्र पढ़े फिर अनामिका (सबसे छोटी अँगुली के पास वाली) अँगुली के निचले, बीच के तथा ऊपर के पोरुये पर क्रमश: मंत्र पढ़े। इस प्रकार एक बार में ९ बार मंत्र पढ़ा जाता है। इस विधि से १२ बार पूरा मंत्र पढ़ने पर १०८ जाप की एक माला हो जाती है।

(३) मालाजाप- सोने, चाँदी, स्फटिक, मूँगे या कन्या के हाथ से कते सूत के १०८ दानों की माला से प्रत्येक दाने पर पूरा मंत्र पढ़ना।

उपरोक्त तीन विधियों में कमल जाप की विधि उत्तम है क्योंकि इसमें उपयोग अधिक स्थिर रहता है। साधक यथाशक्ति किसी भी विधि से मंत्र साधना कर सकता है। उपरोक्त ऐतिहासिक उदाहरणों से निर्विवादित रूप से स्वीकार करना होगा कि आगम में यंत्र, मंत्र, तंत्र का अस्तित्व प्राचीन है एवं उनकी शक्ति भी उल्लेखनीय है। मंत्रों के प्रकार, प्रयोजन व प्रभाव अनेक हैं। उनको विधिवत् समझने व जीवन में उतारने का संकल्प होने पर ही मंत्र कार्यकारी होगा। जिस प्रकार रसायन शास्त्र में विभिन्न पदार्थों के अनुपातिक मिश्रण से अद्भुत क्रियाएँ और रूप प्रकट होते हैं उसी प्रकार शब्दों की सही शक्ति समझकर उनका सही मिश्रण करने से उनमें शांति, आकर्षण, वशीकरण, उच्चाटन एवं रचनात्मक शक्ति पैदा की जाती है। वैसा ही मंत्र बन जाता है। मंत्र सूक्ष्म रूप है बीज रूप है, जिससे बाहृ वस्तुरूपी वृक्ष उत्पन्न होता है, तो दूसरी ओर लोकोत्तर सुख के द्वार भी खुलते हैं। मंत्र की सत्ता अपने आपमें सर्वोपरि है और इसका प्रभाव निश्चित और स्थायी होता है। मंत्र आत्मज्ञान और परमात्मा सिद्धि का मूल कारण है। परन्तु यह तभी संभव हो सकता है जब ज्ञान हृदयस्थ हो जाए और आचरण में ढल जाए।

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