।। चिन्तन-अनुचिन्तन ।।

कुमार वर्धमान महावीर राजभवनों में अपना कुमारकाल बिता रहे थे। वैवाहिक बन्धन तो वे अस्वीकार कर ही चुके थे। उनके पूर्व-संस्कारों ने उनकी विचार-सरणी को प्रशस्त बनाने में पर्याप्त सहायता की। वे कभी संसार की नित्यता का विचार करते, कभी जीव के पर-सहाय के अभाव पर । जीव अकेला ही संसार-झामणरूप जन्म-मरण करता है, इसका कोई साथी नहीं होता। संसार बहुत बड़ा है। इसमें जीव का भ्रमण अनादि-कर्म-परम्परा के निमित्त से होता रहता है-बह स्वयं अपने-आप ही कर्मों से बंध को प्राप्त हो रहा है। भव-भव में प्राप्त होने वाले माता-पिता-बन्धु आदि उसी भव में, जब तक उनकी आयु है, इस जीव के साथ दिखाई देते हैं। जब इस जीव की अथवा उनकी आयु पूर्ण हो जाती है, छोड़ जाते है, अथवा अशुभोदय से वे जीवित भी साथ छोड़ देते हैं। साधारणतया मानवादि शरीर अनेक अपवित्र पदार्थों से निर्मित अपवित्रताओं का पुंज है । इससे मोह करना जीव की अज्ञानता का ही परिचायक है । मन-वचन-काय जैसे-जितने शुभ-अशुभ तीन-मन्द मात्रा में सक्रिय होते है, तदनसार इस जीव के प्रति, कार्माण वर्गणाएँ सम्मुख होती है-इसे आस्रव कहते हैं। इन्हीं कार्माण वर्गणाओं की स्थिति कषायों के अनसार बन्ध-कर्मरूप हो जाती है और जोब प्रकृति, स्थिति, अनभाग और प्रदेशबंध को प्राप्त होता है । मन, वचन, काय की शुभ-अशभ क्रिया रोकने पर कर्म-आगमन रुक जाता है। अर्थात् संवर होता है । कर्म-स्थिति पूरी होने पर अथवा तप द्वारा उनके आत्मा से पृथक कर देने पर उन कमों की निर्जरा हो जाती है। धर्म वस्तु का स्वभाव और कर्तव्य कर्म है। इससे ही कर्म-निर्जरारूप मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। जीव को चाहिये कि वह चौदह राजू प्रमाण लोक-त्रसनाड़ी में भ्रमण से अपने को बचाये, क्योंकि जीव इस लोक में अनादिकाल से अज्ञानवश भ्रमण कर रहा है-इसे शाश्वत सुख की प्राप्ति नहीं हो रही है । जीव का स्वभाव निर्मल, शुद्ध और सच्चा ज्ञान है। इसे चाहिये कि उसकी प्राप्ति का उपाय करे।

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* निनिमित्तमिदं चारु वैराग्यमरिमर्दनः ।'

--योगवासिष्ठ, 211 1120

(हे अरिमर्वन, पनिमित्तक वैराग्य चारु उत्तम कोटि का होता है।)

'तबाऽनिमित्त वैराग्यं सात्विक स्व.विवेकजम् ।'

-वहीं, 2111121

(हे राम तुम्हारा वैराप सात्विक है, क्योंकि वह अनिमित्तक और स्व-विवेक से उत्पन्न है।)

'ते महान्तो महाप्राजा निमित्तेन विनैव हि ।
वैराग्यं जायते येषां तेषां यमल मानसम् ।'

-योगवसिष्ठ, 9111124

(जिनको निनिमित्तक बैरास्या उत्पन्न होता है, वे पुरुषम महान है, महामाश हैं। और वे ही निर्मल मन वाले है।)

'अथ सन्मतिरेकदानिमित्तं, विष येभ्यो भगवान विरक्तः ।'

-अमग, ब. च., 71102,

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द्वादशानुप्रेक्षाएं

उक्त प्रक्रिया को जिन-शासन में द्वादशानुप्रेक्षा* या बारह भावनाओं के नाम से स्मरण किया गया है, प्रत्येक मुमुक्षु, चाहे वह मनि हो अथवा श्रावक, इन भावनाओं पर अपने को स्थिर करने–इनका बारम्बार चिन्तवन करने से शाश्वत सुख की ओरवैराग्य मार्ग की ओर-बढ़ सकता है। इन भावनाओं का वर्णन जैन शास्त्रों में विस्तृत रूप से (प्राकृत, संस्कृत, अपनश, हिन्दी, कन्नड़, महाराष्ट्री, गुजराती आदि) सभी भाषाओं में उपलब्ध होता है । यहाँ प्राकृत के कुछ पद्य उद्धृत किये जाते हैं-

'मोक्खगया जे पुरिसा अणइकालेण बारमणबेक्वं ।
परिभाविजण सम्म पणमामि पुणो पुणो तेसि ।।

(जो पुरुष अनादिकाल से बारह अनुप्रेक्षाओं का अच्छी तरह चिन्तवन कर मोक्ष गये है, मैं उन्हें बार-बार-प्रणाम करता हूँ।)

अनित्यभावना :

'जलबुब्बुदसवकवणुखणरुचिद्यणसोहमिव थिरं ण हवे ।
अहभिदाणाई वलदेवप्पुहुदिपज्जाया ।

(अहमिन्द्र के पद और बलदेव आदि की पर्याय जल के बबूल, इन्द्रधनुष, बिजली और मेघ की शोभा के समान अस्थिर है।)

अशरण भावना :

'मणिमंतोसहरक्खा ागयरहओ य सयलविन्जाओ।
जीवाणं ण हि सरणं तिसु लोए मरणसमयम्हि ।।

(मरण के समय तीनों लोकों में मणि, मंत्र, औषधि, रक्षक, सामग्री, हाथी, घोड़े, रथ और समस्त विद्या किसी जीव को बचाएँ नहीं सकती।)

संसार-भावना :

'पंचविहे संसारे जाइजरामरणरोगभयउरे ।
जिणमग्गमपेचात्तो जीवो परिभभदि चिरकालं ।।

(जिन-मार्ग की प्रतीति किये बिना यह जीव जन्म, जरा, मरण, रोग और भय से परिपूर्ण पंच-परिवर्तन रूप संसार में चिरकाल से घूम रहा है।)

एकत्व भावना :

"एक्को करेदि कम एकको हिडदि य दीह संसारे ।
एक्को जायदि मरदि य तस्स फलं भुजदे एक्को ।।

(जीव अकेला ही कर्म करता है, अकेला ही दीर्घ संसार में भ्रमण करता है, अकेला ही जन्म-मरण करता है, और अकेला ही कर्मों के फल भोगता है ।)

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* 'मनिल्याणरण संसारकत्वान्यात्याच्यासवसंबरनिराधमलोपबोधिदुलभतत्वस्वाख्यान चित्तमनप्रक्षाः ।'

-तत्त्वार्थ सूत्र, 9.7.

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अन्यत्व भावना :

'अगणं इमं सरीरादिगं एवं होज्ज बाहिरं दव।
णाणं दंगणमादा एवं चितेहि अण्णतं ।।

(शरीरादिक जो यह बाह्य द्रव्य है, वह सब मझसे अन्य है, ज्ञान-दर्शन हो आत्मा हैं। इस प्रकार अन्यत्व भावना का चिन्तवन करो।)

अशुचिभावना:

'रसरहिरमांसमेव्हड्डीमज्जसकुलं पुत्तपूयकिमिबहुलं ।
दुग्गंधमसुचि चम्ममयमणिन्चमचेयणं पडणं ।।

(यह शरीर रस, रुधिर, माँस, चर्बी, हड्डी तथा मज्जा से युक्त है, मूत्र, पीव और कीड़ों से भरा है, दुर्गन्धित है, अपवित्र है, चर्ममय है, अनित्य है, अचेतन है और पतनशील नश्वर है । )

आस्रव-भावना:

"मिच्छन्तं अविरमणं कसायजोगा व आसवाहेति ।
पण पण चउ तियभेदा सम्म परिकित्तिदा समए ।।

(मिध्यात्व, अविरति, कषाय और योग ये आस्रव है। इनके क्रमशः पाँच, पांच. चार और तीन भेद हैं जिन्हें शास्त्रों में भलीभांति कहा गया है।

संवर भावना:

'चलमलिनमगादं च बज्जिय, सम्मतदिदकबाडेण ।
मिच्छत्तासबदारीणराहो होदित्ति जिहि णिदिई ।।

(चल, मलिन और अगाढ़ दोष को छोड़कर सम्यक्त्वरूपी दृढ़ कपाटों के द्वारा मिथ्यात्वरूपी आस्रव द्वार का निरोध हो जाता है, ऐसा जिनेन्द्रदेव ने कहा

निर्जरा भावना:

'बंधपदेसग्गलणं णिज्जरणं इदि जिणेहि पण्णत्त ।
जेण हवे संवरणं तेण दुणिज्जरणमिदि जाण ।।

( बंधे हुए कर्म-प्रदेशों का गलना निर्जरा है, ऐसा जिनेन्द्र तीर्थकर ने कहा है। जिस कारण से संवर होता है, उसी कारण से निर्जरा होती है। )

धर्म भावना :

'एयारसदरामेयं धम्म सम्मत्त पुब्वयं भणियं ।
सागारणगाराणं उत्तमसुहसंपजुत्तेहि ।।

( उत्तम सुख से सम्पन्न जिनेन्द्र तोर्थकर ने कहा है कि गृहस्थों तथा मनियों का वह धर्म कम से क्यारह (प्रतिमा) और दश भेदों से युक्त है तथा सम्यग्दर्शन-पूर्वक होता है । )

लोक भावना:

जीवादिपयट्ठाणं समवाओ सो णिच्चए लोगो ।
तिविहो हवेड लोगो अहमज्झिमउड्डभेएण ।।

(जीव आदि पदार्थों का जो सम ह है वह लोक कहा जाता है। अघोलोक, मध्यलोक और ऊर्ध्वलोक के भेद से लोक तीन प्रकार का होता है।)

बोधि-बुर्लभ भावना:

'उपपज्जदि सपणाण जेण उबाएण तस्सुवायस्य ।
चिता हवेड बोहो अच्चंतं दुल्लह होदि ।

( जिस उपाय से सम्यग्ज्ञान उत्पन्न होता है, उस उपाय की चिन्ता बोधि है, यह बोधि अत्यन्त दुर्लभ है । )

वस्तुतः इस जीव को बोधि (ज्ञान) होना अत्यन्त दुर्लभ है। जब किसी जीव के ये हो जाती है तब वह वस्तु-तत्त्व का जानकार हो जाता है और फिर संसार में उसे रुचि नहीं रहती । वह सर्व प्रकार के संग (परिग्रह) के परित्याग पर लक्ष्य करता है। क्षणमात्र में ही उसका मोह विलीन हो जाता है । अत: इस दुर्लभ भावना की प्राप्ति का उपाय करना चाहिये । कविवर भूधरदास जी कहते है--

'धन-कन-कंचन-राजसुख सबहि सुलभ करि जान ।
दुर्लभ है संसार में एक जथारथ ज्ञान ।

( संसार में धन-धान्य, सुवर्ण और राजसुख तो सहज (मित्थ्यात्व में भी) प्राप्त हो सकते हैं। मिथ्यात्वी जीव नव ग्ने बेयक के सुखों तक को प्राप्त कर सकता है , परन्तु संसार में सम्यक् (सच्चा आत्मसुख-प्रापक) ज्ञान, बिना सम्यग्दर्शन के हुए नहीं हो सकता।)

बोधि अर्थात् सम्यग्ज्ञान

उपनिषद् की भाषा में कोई धीर पुरुष ही बहित्ति को रोककर अन्तःचक्षओं (ज्ञान) से आत्मा को देख पाता है । ऐसा धीर पुरुष सम्यग्दृष्टि ही हो सकता है । सम्यक ज्ञान का नाम 'बोधि' है और उसका सम्बन्ध आत्मस्वभाव-यथातथ्य जानने से है । जो ज्ञान, पदार्थों के यथार्थ (नग्न ) स्वरूप को प्रकट नहीं कर सकता, जिसकी बत्ति पदार्थ के विकृत रूप अथवा उसके जानने में है, वह ज्ञान नहीं, अपितु कु-ज्ञान, मिथ्या ज्ञान है, संसार में भ्रमण कराने वाला है । खेद है, आज के विज्ञानयुग में जबकि मानव का मस्तिष्क चन्द्र और मंगल लोक आदि की खोज में तत्पर है, तब वह अपने में ही आच्छन्न शक्ति का अन्वेषण नहीं करता । यदि यह क्षण-मात्र को भी अपनी ओर दृष्टिपात करे, अपने यथार्थ स्वरूप को देखे, तो इसका सहज ही उद्धार हो जाए, इसका ज्ञान सम्यग्ज्ञान हो जाए, इसे बाह्य की चिन्ता न रहे ।

बैराग्य-संवर्धन

कुमार वर्धमान के अन्तस्तल में जाग्रत भावना 'सर्वकर्मविप्रमोक्ष' का द्वितीय चरण था। प्रथम पग तो बे सोलहकारण भावनाओं द्वारा ही बढ़ा चके थे। अब तो उन्हें पूर्ण ज्ञान और पूर्ण चारित्र की प्राप्ति करनी थी। वे गृहवास त्यागने का विचार ही कर रहे थे कि लोकान्तिक देव आ उपस्थित हुए। उन्होंने कुमार की वैराग्यभावना को समर्थन दिया। वे बोले—

चौपाई

'धनि बिबक यह धन्य सयान । धनि यह औसर दयानिधान ।।
जान्यो प्रभ संसार असार । अधिर अपावन देह निहार ।।
जुदासीन असि तुम कर धरी । आज मोह सेना थरहरी ।।
धरिये देव महाव्रत भार । करिये करम-शत्रु संहार ।।
हो जिन तुम जगतारनहार । तुम बन हो इह कर विचार ।।
धर्म जिहाज प्रकाशन बीर । जग-जलनिधि तुम तारनतीर ।।
तुम बिन जगत जीव दुख लहै । लौकान्तिक सुरथुति इमि कहें ।।

ये सब प्रक्रिया (तीर्थकर के लिए) उपचार मात्र है। लोक में प्रस्तावों के समर्थन की परिपाटी इसी क्रिया का प्रतिरूप है। अन्तर केवल इतना ही है कि जब यहाँ प्रस्ताव-समर्थन से प्रस्तावक को बल मिलता है, तब तीर्थकर की विचार-सरणि को दढ़ करने से मात्र देबों का नियोग पूरा होता है। तीर्थकर तो विचार के स्वयं धनी है, किसमें सामर्थ्य है जो अन्तन्तः बलशाली को बल दे सके, सूर्य को दीपक दिखा सके ?

ज्ञान-ज्योति प्रज्वलित

लौकान्तिक देवों के जाने के बाद, जब कुमार वर्षमान के माता-पिता को कुमार की विरक्ति का परिज्ञान हुआ, वे बड़ी चिन्ता में पड़ गये, उनमें मोह जाग उठा । वे पुत्र-स्नेह में विह्वल हो गये। उनके हृदय में विचार आया कि राज-सुख में पला हुआ हमारा पुत्र वन-पर्वतों में नग्न रहकर सर्दी, गर्मी के कष्ट किस प्रकार सहन करेगा?

1. पार्श्वपुराण, 7110-12, 17,
2. मनसुखसागर, 63-64,

वन-पर्वतों की कंटीली-कंकरीली भूमि पर अपने कोमल नग्न पैरों से कैसे चलेगा? नगे सिर धूप, ओस और वर्षा में कैसे रहेगा? कहाँ कठोर तपश्चर्या और कहाँ हमारे पुत्र का कोमल शरीर ? आदि प्रसंगों को सोचते-सोचते माता त्रिशला तो मच्छित ही हो गई। क्यों न हों ? आखिर, माता का हृदय ही तो है, जग में ऐसी कौन-सी माता होगी जो अपने पुत्र-वियोग में दुःखी न होती हो--सभी को दुःख होता है । अपने प्रिय बालक को अपने से अलग जाता हुआ देखकर वन्य और दीन-हीन प्राणी हरिणी भी सिंह का प्रतिकार करने का साहस करती है।

ज्यों मूगि निजसुत पालन हेत,
मृगपति सन्मुख जाय अचेत।

फिर माता त्रिशला तो सामर्थ्यशीला और तीर्थकर की माता थीं । वे कसे अपने पुत्र को अपने से पृथक् करना पसन्द करती ? उनका अचेत होना स्वाभाविक था।

उपचारों के अनन्तर जब माता सचेत हुई, तीर्थंकर-परिवार और नगरवासी एकत्रित हुए, तब कुमार ने उन्हें संसार की असारता का दिग्दर्शन कराते हुए उनसे अपने बन जाने की बात कही। और कहा कि मझे श्रमण दिगम्बर मनि बनने की आज्ञा दीजिय; क्योंकि इस वृत्ति (वेश ) को धारण किये बिना मुक्ति नहीं है और मक्ति के बिना जीव का कल्याण नहीं है, आदि ।

बाल ब्रह्मचारी कुमार का ऐसा करना उचित ही था। उन्हें आगे का मार्ग भी खोलना था और आदि तीर्थंकर से चली-आती परम्परा का निवाह भी करना था । दीक्षा के भी अपने नियम है, उनमें से एक कुटुम्बवर्ग आदि से अनुमोदन लेना भी है जिसका शास्त्रों में विधान भी किया गया है । वहाँ लिखा है कि प्रभु राजा आदि और ज्ञातवर्ग से आज्ञा लेकर अन्तरंग-बहिरंग दोनों प्रकार के परिग्रहों को छोड़कर नग्न दिगम्बर मनि बन गये। उन्होंने कहा--'आप हमारे इस पुद्गलमय शरीर के जनक तथा जननी हैं, हमारी आत्मा आपके निमित्त से उत्पन्न नहीं हुई है। हमारी चैतन्यमय आत्मा अनादि निधन है, यह आप दोनों भलीभांति जानते हैं। आज हमारी आत्मा में ज्ञानज्योति अज्ञान-भाव को दूर कर प्रदीप्त हुई है । वह आत्मा अपने अनादिः जनक के समीप जाना चाहती है। इस कारण हम आपसे आज्ञा चाहते हैं कि आप हमारी आत्मा को छोड़ दें।

तीर्थंकर कुमार की ज्ञानमयी दिव्य वाणी को सुनकर माता त्रिशला और परिवार के ज्ञान-नेत्रों के खुलने और मोह-तम के विलय में देर न लगी। जैसे मेघाच्छन्न आकाश में सूर्य की प्रभा अप्रकाशित रहती है लोगों की दृष्टि में नहीं आती और प्रबल वायवेग से घनपटलों के अस्त-व्यस्त होने पर उससे लोक प्रकाशित हो उठता है, वैसे ही कुमार वर्धमान की दिव्यवाणी से माता त्रिशला और परिवार के ज्ञान-सूर्य के चमकने में देर न लगी। उनके मोहरूपी बादल पूर्णतया छट गये। उन्हें प्रसन्नता एवं गौरव का अनुभव होने लगा। उनका पुत्र, उनका ज्ञात वंशज, संसार के अज्ञान-तम को दूर करेगा, संसार का उद्धार और आत्मकल्याण करने का श्रेय प्राप्त करेगा। ऐसा विचार कर सब ने कुमार को दीक्षा-रूपी पुण्यतम कार्य की अनुमति दी और अपना नियोग पूरा किया। वे चिरकाल तक मन-ही-मन गुनगनाते रहे ---

'स्त्रीणांशतानि शतशो जनयन्तिपुवान्, नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता ।
सर्वादिशो दति भानसहवरश्मि, प्राच्यव दिजनयति स्फुरदंशुजालम।

सन्त चरण जहँ-जहँ धरें, पावन तीरथ होय

कुण्डलपुर और उसके निकटवर्ती तपोवन की भूमि धन्य है, जहाँ तीर्थकर के चरण पड़े और चरण-रज से जहाँ की धलि पवित्र हुई। मार्गशीर्ष कृष्णा दशमी का दिन भी बड़ा पवित्र है जिस-दिन तीर्थंकर (कुमार) की दीक्षा हुई। स्वर्ग के इन्द्र और देवगण का भी बड़ा सौभाग्य-दिन है, जो उन्हें 'जिन' के निष्त्रमण-महोत्सव कराने का सौभाग्य मिला । स्वर्गों में अन्य लोकों में, योनियों में, विविध सख सविधाओंके विद्यमान होने पर भी संयम धारण-रूप सूख का सर्वथा अभाव है। वे इस संयम को तरसते ही रहते है। मुनिपद केवल मनुष्य-भव में ही संभव है, वे पुरुष धन्य है जिन्होंने दुर्लभ मनुष्य-भव को पाकर तप और दीक्षा ग्रहण रूप कार्य किया। लोक में ज्ञानी बहुत हैं-तत्ववेत्ता और व्याख्याताओं का भी बाहुल्य मिल सकता है, किन्तु ज्ञानपूर्वक चारित्र धारण करने वाले विरले ही होते हैं। कहा भी है- 'ज आचरहि ते नर न घनेरे।'

कुछ लोग जन्म से ही साधु होते हैं, कुछ लोग साधु बन जाते हैं और कुछ को साधु बनाया जाता है । कुमार वर्षमान प्रथम श्रेणी के साधु थे, उनके भावों में वीतरागता विद्यमान थी, केवल बाह्य उपक्रम शेष था, जो अब पूरा हो रहा है। देवोपनीत वस्त्राभरण धारे हुए कुमार वर्धमान दैगम्बरी वृत्ति-हेतु बन जाने को तैयार हैं, 'चन्द्रप्रभा' नामक देव-पालकी उनके सामने है, कुण्डलपुर का आँगन भी महाराजा-राजा-देव और मानवों से व्याप्त है । सब प्रतीक्षा कर ही रहे थे कि वर्धमान कुमार ने पालकी में पाँव रखा और बैठ गये । सब ने हर्ष से जय-जयकार किया और भमिगोचरी राजाओं ने पालकी को कन्धों पर उठाया। कुछ दूर उसे विद्याधर ले चले, इन्द्र और देवों ने भी इस पुण्य अवसर का लाभ उठाया । इस महिमा का वर्णन करना अशक्य है-

'जिस साहब की पालकी, इन्द्र उठावन हार ।
तिस गुनमहिमा-कथन अब पूरन होउ अपार ।।

--पार्श्वपुराण, ७।१२७

चन्द्रप्रभा । पालकी धन्य हई और वह बनखण्ड धन्य हआ जहाँ तीर्थकर ने मुनि-वृत्ति धारण की। दिगम्बरी रूप धारण करने का काल उत्तराफाल्गनि नक्षत्र और मार्गशीर्ष कृष्णा दशमी भी धन्य हुए। ज्ञातखण्ड बन में पहुंचकर कुमार वर्धमान पालकी से उतरे। वे वहाँ एक सुन्दर शिला पर विराजमान हुए। कुमार के सम्पर्क से शिला की शोभा में चार चाँद लग गये, वह चमचमा उठी। इन्द्राणी ने उसे रत्नचर्ण के स्वस्तिक से पहिले ही अलंकृत किया था। कुमार वर्धमान ने अपने समस्त बस्त्राभरण उतारे और नग्न दिगम्बर हो गये। उन्होंने अपने केशों का उत्पाटन (केशलोच) भी अपने हाथों से किया (पंच मष्टि लोंच कोना)। लोच शरीर से मोह त्याग कर एक चिह्न मात्र है। उन्होंने "नमः सिद्धम्यः' कहते हुए सिद्धों को नमस्कार कर पाँच महाव्रत धारण किये और सर्व-सावद्य का त्याग कर पद्मासन मद्रा में आत्म-ध्यानस्थ हो गये-सामायिक में मग्न हो गये। इन्द्र ने केशों को रत्न-मंजषा में रखा और उसे समुद्र-क्षेपण कर दिया तथा देवों सहित दीक्षा-उत्सव मनाकर अपने धाम को चला गया। सब ने श्रमण दिगम्बर मुनि श्री वर्धमान के दर्शन कर अपने को धन्य माना । वे चाहने और उस दिन की प्रतीक्षा करने लगे जिस शभ दिन बे भी दिगम्बर वेश धारण कर सकेंगे, क्योंकि दिगम्बरत्व के बिना मुक्ति नहीं।