।। निर्ग्रन्थता : एक निर्मल तथ्य ।।

'निर्गन्थं निर्मलं तथ्यं पुतं जैनेन्द्र शासनम् ।
मोक्षवमति कर्तव्या मतिस्तेन विचक्षणः ।।

-सुभा. रत्न-संदोह, ८२८

निर्ग्रन्थता निर्मल तथ्य है, जैनशासन में इसे पवित्र बतलाया गया है। यह निर्ग्रन्थत्ता ही मोक्ष का मार्ग है, इसलिए विद्वानों (वस्तुतत्त्वज्ञाताओं) को निर्ग्रन्थ बनने की दिशा में अपनी बद्धि को मोड़ना चाहिये।

वर्धमान उक्त तथ्य से भलीभांति परिचित थे। वे सच्चे निर्ग्रन्थ हो गये। जहाँ उन्हें किसी ग्रन्थ (परिग्रह) से लिपटे रहना अभीष्ट नहीं था, वहाँ उन्हें किसी ग्रन्थ ' (शास्त्र और पुस्तक) से भी मोह नहीं था। व अनन्त (विश्वदृष्टा) ज्ञान के उपासक बनने के पथ पर थे, उन्होंने विश्व-तथ्य को जाना। विश्व के पदार्थों के स्वभाव को परखने--उनमें भेद देखने की उन्हें दृष्टि प्राप्त थी । वास्तव में स्वभाव -दशा की दृष्टि से छहों द्रव्य अपने स्वरूप में है-एक में दूसरे के गुण-धर्म नहीं । जब मानव को पदार्थ-परीक्षण में भ्रान्ति होती है-बपरीत्य होता है, तब वह पर-पदार्थ के स्वरूप को किसी अन्य पदार्थ का स्वरूप मान लेता है, और इस प्रकार अज्ञान में फंस जाता है।

निर्ग्रन्थ, दिगम्बर, मुक्त

निग्रन्थ शब्द जैन शासन का रूदि-शब्द है। यह शब्द परिग्रह-राहित्य के अर्थ में लिया गया है, अर्थात् जो नग्न (स्व-स्वरूप अवस्थित) और रूप अकिंचनता यथाजातमुद्रा को ग्रहण करते हैं वे निर्ग्रन्थ या दिगम्बर व्यपदेश पाते हैं। बिना इस स्वरूप के धारण किये मक्ति नहीं । निर्ग्रन्थ और दिगम्बर दोनों शब्द बड़े महत्व के है और ये दोनों रूप ही मुक्ति में साधक हैं, क्योंकि इनमें और मुक्ति शब्द में पूरापूरा भावसाम्य है। मुक्ति पूर्ण छुटने को कहते हैं और उक्त दोनों पद भी छूटने के प्रारूप हैं। अन्तर मात्र इतना है कि मुक्ति कर्मों से छुटकारे में है और उक्त स्वरूपधारी सांसारिक बाह्य परिग्रहों से छुटे हुए हैं। उनका ध्यान मात्र संयम की रक्षा पर केन्द्रित होता है। उन्हें इन्द्रिय-संयम के लिए किसी बाह्य साधन की आवश्यकता नहीं होती; परन्तु प्राणि-संयम के लिए (उपकरण) मयूर-पिच्छि" और कमण्डल रखने पड़ते हैं। उक्त दोनों उपकरण बाह्य में निर्ग्रन्थ की पहिचान कराने में भी (लोगों को) सहायक होते हैं। अर्थात् जिन पर मयूर-पिच्छि और कमण्डल हों और यथाजात-दिगम्बररूप हों वे ही निर्ग्रन्थ मुनि होते हैं, ऐसा ग्रन्थों में कहा गया है—

मयूरलिंगीनिग्रन्थो नित्य केशविलंचनः ।
अन्तरायविधिनाज्ञो मलापूरित विग्रहः ॥

-काव्यशिक्षा, विनयचन्द्र सुरि, १४७

उत्सर्ग मार्ग; अपवाद मार्ग

उपत कारिका निर्ग्रन्थ और मयुरलिंगी दोनों का व्यपदेश कर रही है । दिगम्बर रूप के होने में मल कारण यह है कि आबरण उनके संयम का साधक न हो, बाधक ही बन सकता और बनता है। आवरण से इन्द्रिय-संयम और प्राणि-संयम किसी को भी सहायता नहीं मिलती। संयम का साधन वह होता है जो इन्द्रिय-जय और प्राणि रक्षा में हेतु-भूत हो । ग्रन्थों में उत्सर्ग और अपवाद ऐसे दो मार्गों के नाम भी देखने को मिलते हैं। इनमें उत्सर्ग मार्ग सार्वकालिक और अपवादमार्ग अल्पकालिक समझने चाहिये । इतना विशेष है कि जब किन्हीं अनिवार्य कारणों (जैसे दुभिक्ष, भयानक रोग आदि) से कोई निर्ग्रन्थ ( दिगम्बर ) अपने नियमों के पालन में सर्वथा असमर्थ हो जाए तो वह अपवाद-मार्ग स्वीकार करता है पर इस अपवाद-मार्ग में उसे अपने पद से च्युत होना पड़ता है और बाधक कारणों के परिहार होने पर उसे प्रायश्चितपूर्वक उत्सर्ग मार्ग में स्थित किया जाता है। यदि अपवाद-मार्ग को सर्वथा, सर्वकाल स्वीकार किया जाए तो वह अपवाद-मागं न रहकर उत्सर्ग-मार्ग ही हो जाएगा और निम्रन्थ का रूप ही बदल जाएगा, जोकि ऊपर बतलाये लक्षण से सर्वथा विपरीत और मक्ति-मार्ग में बाधक सिद्ध होगा।

अप्पाअप्पमि रओ

मुनि मोक्षमार्ग में स्थित होता है। उसके लिए परिग्रह सर्वथा त्याज्य है। वही विद्वान् है और वही अनन्त सुख पाता है, जो परिग्रह से रहित है, दिगम्बर, बातवसन, निर्ग्रन्थ और निरम्बर है :( वीर वर्धमान ने इसी मार्ग का अनुसरण किया। वे स्थिर आसन होकर अपनी चित्तवृत्ति का निरोध कर आत्मस्थ हो गये । ठीक ही है-जब तक मन-वचन और कार्य पर अंकुश न हो, इनकी क्रिया का निरोध न हो तब तक ध्यान नहीं होता; इसीलिए म नियों-ध्यानियों के लिए एकान्तवास और मन के निरोध का विधान किया गया है। एकान्तवासी मनि ही मोक्षपद पाते हैं। सांसारिक सुख, सूख नहीं है।

'वासे बहूनां कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि ।
एक एव चरेत्तस्मात्कुभार्या इव कंकणम् ।

बहु-समुदाय में कलह होता है । यदि दो हों तब भी परस्पर वार्तालाप हो जाता है अत: ज्ञानी (ध्यानी-मनि) को सदा एकाकी ही रहना चाहिए, जैसे कुमारी कन्या के हाथ में प्रायः एक कंकण होता है। अतः वह शान्त (निःशब्द) रहता है और सुहागिन की अनेक चड़ियाँ खन-वन शब्द करती रहती है।

चित्त स्थिर किये बिना ध्यान नहीं। उसमें तो चेप्टा, बोलना और चिन्तवन मात्र भी हेय है। * फिर ध्यानस्थ वर्धमान अपने चित्त को चंचल कस रख सकत थे? उन्होंने मन पर काब पा लिया था-वे उसे जिस स्थिति में रखते, वह रहता। आखिर, क्यों नहीं? मन ही तो संसार है, वही रागादि वासनाओं तथा क्लेश का स्थान भी है।

'चित्तमेव हि संसारो रागादिक्लेशवासितम ।
तदैव विनिमुक्तं भवान्त इति कथयते ।।

(रागादि क्लेश बासनामय चित्त को संसार कहते है और जब वहो चित्त रागादि क्लेश-वासनाओं से मुक्त हो जाता है, तब उसे भवान्त, अर्थात निर्वाण कहते है; ऐसा लोक में व्यवहार है।)

निर्ग्रन्थ: संपूर्ण ग्रन्थ-त्याग

वर्धमान एकाकी, चित्तवृत्ति को रोके हुए थे। उनकी आत्मा, आत्मा में स्थित थी, वे किसी परिग्रहरूपी ग्रन्थि से बंधे न थे, नग्न दिगम्बर थे। किसी सम्प्रदाय विशेष के ग्रन्थ भी उन्हें किसी परिधि में न बांध सके। उनकी स्वयं की सत्ता स्वय में स्वतन्त्र थी, उनका ज्ञान विशद, निर्मल और विश्व के पदार्थों के स्वरूप को समझने वाला था। उन्होंने सब कुछ छोड़ दिया था, वे वास्तविक निर्ग्रन्थ थे। ऐसे निर्ग्रन्थ के जिसे दर्शन हो जाएं उसे तीर्थ और तप की क्या आवश्यकता? निर्ग्रन्थों के दर्शन का ही बड़ा माहात्म्य है-दर्शनमात्र से असंख्यातगणा कर्मनिर्जरा हो जाती है। निग्रन्थों का स्वरूप और माहात्म्य बतलाते हुए विभिन्न स्थानों पर कहा गया है कि-

'संसार दुःख मूलेन किमनेन ममेति यः ।
नि:शेष त्यजति ग्रन्थं निग्रन्थं तं विजिनाः ।।

--सुभा, संदोह, ८४१

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'मा चिट्ठह मा जपह मा चिन्तह कि वि बेण हो पिरो।
अप्पा अप्पम्मि रो इणमेव परं हवे प्रमाण ।।

-प्राचार्य नमिचन्द्र, द्रव्यसंग्रह, 56.

(कुछ चेष्टा मत करो, कुछ मत बोलो, कुछ विचार मत करो। आत्मा मात्मा में लीन रहे, यह ध्यान का स्वरूप है।

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संसाररूप वक्ष के मल इस ग्रन्थ (आसक्तिभाव, परिग्रहधारण, रागभाव) से मरा क्या प्रयोजन है ? ऐसा मानकर जो सम्पूर्ण ग्रन्थ का त्याग करता है, उसे जिनेन्द्रदेव ने निर्ग्रन्थ कहा है।

नीरागपिछन्नसन्देहा गलितग्रन्थयोs/नद्य ।
साधबो यदि विद्यन्ते कि तपस्तीर्थसंग्रहैः ।।

-योगवासिष्ठ, २।१६।११

आदि वीतराग, सन्देह-रहित ज्ञानी (अर्थात् सम्यग्ज्ञानी) ग्रन्थ-रहित अर्थात् जिन पर तिल-तुषमात्र परिग्रह नहीं हैं, और निष्पाप (निर्दोष) साधु-मुनि विद्यमान है तो तप करने और तीर्थ पर जाने के समान है-ऐसे साधु ही साक्षात् तपतीर्थ हैं) । एसे निम्रन्थ परम दिगम्बर वीतरागी मनि-श्रीवर्धमान को हमारे शतशत बन्दन, नमोऽस्तु और प्रणाम है।