भक्तामर स्तोत्र काव्य
।। भक्तामर स्तोत्र काव्य 17-18 ।।

काव्य : 17

नास्तं कदाचिदुपयासि न राहु गम्यः,
स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्जगन्ति।
नाम्भो-धरोदर निरुद्ध-महा प्रभाव
सूर्याति शायि-महिमासि मुनीन्द्र! लोके ॥१७॥

अस्त न होता कभी न जिसको, ग्रस पाता है राहु प्रबल।
एक साथ बतलानेवाला, तीन लोक का ज्ञान विमल॥
रुकता कभी प्रभाव न जिसका, बादल की आ करके ओट।
ऐसी गौरव-गरिमावाले, आप अपूर्व दिवाकर कोट॥१७॥

काव्य : 17 पर प्रवचन

प्रभो! आप सूर्य जैसे नहीं, अपितु उसकी अपेक्षा भी अधिक महिमावन्त हो। सूर्य तो अस्त हो जाता है परन्तु आपका ज्ञान कभी अस्त नहीं होता; राहू कभी आपको घेर नहीं सकता; सूर्य के समान मात्र दिन में ही और पृथ्वी के थोड़े से भाग को नहीं, अपितु एकसाथ समस्त जगत् को आप निरन्तर प्रकाशित करते हो और घनघोर बादल भी आपके ज्ञानप्रकाश को रोक नहीं सकते – इस प्रकार हे मुनीन्द्र ! सूर्य की अपेक्षा भी आपका अतिशय महान है।

देखो, भगवान के भक्त को जगत् की कोई वस्तु परमात्मा से अधिक नहीं लगती। श्लोक 13 में कहा है कि प्रभु को चन्द्रमा की उपमा लागू नहीं पड़ती; फिर दीपक की उपमा लागू नहीं पड़ती – ऐसा श्लोक 16 में कहा और श्लोक 17 में कहते हैं कि हे देव! आपको सूर्य की उपमा भी लागू नहीं पड़ती।

आपका केवलज्ञान, चन्द्रमा या दीपक, इन सब से पार कोई अदभुत, आश्चर्यकारी है। सूर्य तो जगत् को आताप करनेवाला है, परन्तु हे ज्ञानसूर्य ! आपका ज्ञान तेज तो जगत् को अपूर्व शान्ति देनेवाला और आताप हरनेवाला है। आपके ज्ञानसूर्य का उदय हुआ, वह कभी अस्त होनेवाला नहीं है; किसी कर्म का बादल, अब उसके दिव्य प्रकाश को आच्छादित नहीं कर सकता है। ज्ञान-दर्शन के आवरणरूपी बादल को आपने सर्वथा छिन्न-भिन्न कर डाला है। सूर्य के प्रकाश को तो पटल आदि रोकते हैं परन्तु आपके ज्ञानप्रकाश को लोहे की दीवार भी नहीं रोक सकती है - आप ऐसे अद्वितीय ज्ञानभानु / ज्ञानसूर्य हो।

इस जम्बूद्वीप में दो सूर्य और दो चन्द्रमा हैं परन्तु वे एक जम्बूद्वीप को भी सम्पूर्ण प्रकाशित नहीं कर सकते हैं, जबकि सर्वज्ञप्रभु का केवलज्ञान तो एकसाथ जगत् के सभी पदार्थों को प्रकाशित करता है। गहरी गुफा आदि में या जीव के अरूपी भावों में तो सूर्य का प्रकाश पहुँचता ही नहीं, परन्तु जगत् में ऐसा कोई स्थान या क्षेत्र नहीं है, जहाँ प्रभु के ज्ञानसूर्य का प्रकाश न पहुँचता हो। हे नाथ! ऐसा दिव्य ज्ञानप्रकाश आपके अतिरिक्त अन्य किसका है ? और आपके ऐसे ज्ञानप्रकाश की प्रतीति करने की सामर्थ्य हमारे जैसे जिनभक्त के अतिरिक्त अन्य किसमें हैं? – 'अहो, यह ज्ञान की महिमा !'

इस स्तोत्र में स्तुति तो ऋषभदेव की है, परन्तु जिनमें ऐसा दिव्यज्ञान हो, उन सभी सर्वज्ञ भगवन्तों की गुणस्तुति इसमें समा जाती है। ऐसे गुणवाले अनन्त तीर्थङ्कर, अरिहन्त हो गये हैं और अनन्त होंगे। अभी भी विदेहक्षेत्र में ऐसे लाखों सर्वज्ञ भगवन्त विचरण कर रहे हैं। प्रभु की प्रभुता को पहचानकर, जीव को सम्यक्त्व और भेदज्ञान हो जाता है। जो भगवान जैसे ज्ञानानन्दस्वभाव की प्रतीति और प्रीति करता है, वह जीव, भगवान का भक्त हो सकता है। सर्वज्ञ स्वभाव की प्रीति / प्रतीति करने से इन्द्रियों-राग या संयोगों की प्रीति छूट जाती है, जिससे उस जीव को परमार्थ से जितेन्द्रिय कहा जाता है।

समयसार गाथा – 31 में कहा है कि –

जो इन्द्रियों को जीत जाने ज्ञानमय निज आतमा।
वे हैं जितेन्द्रिय जिन कहें परमार्थ साधक आतमा॥

साधक कहता है : हे जगत् के अद्वितीय सूर्य! आप ही हमारे नेता और पिता हो, हम आपके बालक है और भक्ति करते-करते आपके मार्ग पर चल रहे हैं। हमने अपने अन्तर में ऐसी दृढ़ भक्ति से आपको वसा लिया है कि उससे अब संसार का भय नहीं है ? 'जहाँ भगवान वसते हैं, वहाँ कैसे भव और कैसा भय?'

आकाश में जो सूर्यबिम्ब दिखायी देता है, वह तो अचेतन प्रकाश का पुञ्ज है; और हे भगवान! आप तो चैतन्यप्रकाशी सूर्य हो; सूर्य गरम है, आप शान्त हो, ‘चन्देषु निम्मलयरा...... आइच्चेसु अहियं पयासकरा' लोग्गस-सूत्र द्वारा स्तुति करते हुए कहते हैं कि 24 तीर्थङ्कर-केवली भगवन्त, चन्द्रमा की अपेक्षा भी अधिक निर्मल है और आदित्य-सूर्य की अपेक्षा भी अधिक प्रकाश करनेवाले हैं। अरे, तीर्थङ्करों का शरीर भी चन्द्र-सूर्य की अपेक्षा अधिक उज्ज्वल और तेजस्वी होता है, तो केवलज्ञान की शोभा की तो क्या बात!

प्रभो! आपको ऐसा पूर्ण केवलज्ञान सूर्य उदित हुआ है और मुझे अभी उसका प्रभात है.... परन्तु प्रभात के बाद अल्प काल में पूर्ण सूर्य उदित होना ही है और उसकी तत्परतापूर्वक हम आपके गीत गाते हैं। यह सूर्य तो दिन में उदित होकर शाम को अस्त हो जाता है, जबकि आपका उदित केवलज्ञान सूर्य कभी अस्त नहीं होता; उस पर कर्म का आवरणरूप कोई ग्रहण नहीं है। पूर्णिमा को चन्द्रमा के प्रकाश को तथा अमावस्या को सूर्य के प्रकाश को राहु आड़े आता है; इसलिए ग्रहण होता है, परन्तु प्रभु ने तो ज्ञानावरणरूप राहु को नष्ट कर दिया है; इसलिए प्रभु के ज्ञान में अब कोई ग्रहण नहीं है और प्रभु की प्रतीतिवाले भक्त को कोई राहु अवरोधक नहीं है, वह तो आनन्दपूर्वक मोक्ष को साधता है।

आज जो सूर्य यहाँ दिखायी देता है, वह कल नहीं आता; कल दूसरा सूर्य आयेगा; कल का सूर्य आज ऐरावतक्षेत्र में प्रकाशित होगा और कल जो ऐरावत में था, वह सूर्य आज यहाँ आया है, परन्तु हे नाथ! आप तो भरत, ऐरावत या विदेह सभी क्षेत्रों को एकसाथ प्रकाशित करनेवाले हो; इसलिए आप ही जगत् के अद्वितीय सूर्य हो। ऐसी भक्ति करनेवाले जीव को भविष्य में साक्षात् भगवान के दर्शन होंगे और वह स्वयं भगवान बन जाएगा।


काव्य : 18

नित्योदयं दलित-मोह-महान्धकारं,
गम्यं न राहुवदनस्य व वारिदानाम्।
विभ्राजते त मुखाब्जमनल्पकान्ति,
विद्योतयज्ज गद पूर्व-शशाङ्क-बिम्बम्॥१८॥

मोह महातम दलनेवाला, सदा उदित रहनेवाला।
राहु न बादल से दबता पर, सदा स्वच्छ रहनेवाला॥
विश्व-प्रकाशक मुखसरोज तव, अधिक कान्तिमय शान्तिस्वरूप।
है अपूर्व जग का शशि-मण्डल, जगत शिरोमणि शिव का भूप॥१८॥

काव्य - 18 पर प्रवचन

हे प्रभो ! मैं आपको चन्द्रमा जैसा कहूँ? नहीं! आप तो उससे भी विशेष हो। आप सदा काल उदयरूप हो; राहु या बादल, चन्द्रमा के समान आपको घेर नहीं सकते; आपका उदय मोह-अन्धकार को दूर करनेवाला है। कोई अपूर्व कान्ति से शोभित आपका मुखमण्डल, जगत् में अपूर्व उद्योत करनेवाला है। 13 वें श्लोक में भी यह बात की थी कि हे देव! आपके दिव्य तेज के समक्ष चन्द्रमा का तेज भी फीका पड़ जाता है। उस चन्द्रमा में मोहरूपी अन्धकार को दूर करने की ताकत नहीं है, अपितु वह तो रात्रि में जीवों को मोह में (निद्रा में) डालता है; जबकि आपकी वाणी की किरणें तो हमें मोहरूपी निद्रा से जगाती है और हमारे अज्ञानरूपी अन्धकार को भगाती हैं। जिसके अन्तर में आपकी ज्ञान किरणों का प्रवेश होता है, उसकी आत्मा में उजाला हो जाता है और कर्म के बादल बिखर जाते हैं - ऐसे अद्वितीय चन्द्र, हे सर्वज्ञ! आप ही हो। चन्द्रमा की अपेक्षा भी आपमें विशेषता है।

देखो तो सही, वीतराग भगवन्त की यह भक्ति! भक्त, जहाँ देखो वहाँ भगवान की महिमा ही देखता है; आकाश में सूर्य-चन्द्रमा देखते हुए भी उसे सर्वज्ञ भगवान याद आते हैं। अन्दर में भगवान को देखता है और बाहर में भी भगवान को ही देखता है। भगवान की भक्ति के रंग में संसार को भूल जाता है। उसे राग या स्वर्ग तो याद ही नहीं आता। बस, अन्दर में केवलज्ञान और भगवानपना ही निरन्तर चलता रहता है। थोड़ा-सा राग होने पर भी वीतरागभाव की ओर का जोर उछलता है – इसका नाम वीतरागी भक्ति है।

अरे, लोग भगवान को पहचानते नहीं हैं। जिनके हाथ में हथियार या सङ्ग में स्त्री होती है, जो खाते-पीते हैं, जिन्हें राग या रोग होता है, वे भगवान नहीं हैं; भगवान तो परमशान्त-वीतराग हैं, सर्वज्ञ हैं; जिनके स्त्री नहीं, राग नहीं, हथियार नहीं, क्षुधा -तृषा या रोग नहीं है - ऐसे भगवान को पहचाने तो अन्दर में भगवान आत्मा की पहचान होती है। जो भगवान को पहचानने में भी भूल करता है, वह आत्मा का सच्चा स्वरूप नहीं पहचान सकता।

अरे! दुनिया को कहाँ खबर है कि भगवान कैसे होते हैं! उन्हें तो उनके भक्त... साधक धर्मात्मा ही पहचानते हैं। एक उत्तम राजा भी पुण्यप्रकृति से कैसा सुशोभित होता है ! तो यह तो तीन लोक के धर्मराजा तीर्थङ्कर.... उनके अन्तर में सर्वज्ञता का अतीन्द्रिय वैभव और बाहर में धर्मसभा का दिव्य वैभव, उनकी महिमा की क्या बात ! जहाँ ऊपर से विमान में इन्द्र उतरते हैं और प्रभु-चरण में झुकते हैं; सिंह-बाघ जैसे तिर्यञ्च, शान्त होकर प्रभु के मुख को देखते हैं; मुनिराज, प्रभु की भक्ति करते हैं; रत्नों की वृष्टि होती है; अनेक जीव, सम्यग्दर्शन -ज्ञान-चारित्र प्राप्त करते हैं – साधारण पुण्यवाले जीवों को ऐसी बात देखने-सुनने को कहाँ से मिलेगी?

भगवान की ऐसी अचिन्त्य महिमा जिसके अन्तर में हो, उसके महासद्भाग्य की क्या बात ! वह तो मानो मोक्ष के दरबार में आया है।

एक बार आहारदान प्रसङ्ग की रत्नवृष्टि आदि में किसी ने शङ्का की, तब श्रीमद्राजचन्द्रजी ने कहा - अरे भाई! आत्मा की अचिन्त्य शक्ति की महिमा के सामने रत्नवृष्टि की क्या बात है ! परमात्मवैभव के सामने पुण्यवैभव का क्या आश्चर्य ! चैतन्य की पूर्ण पवित्रता प्रगट हई, उसके साथ का पुण्य भी जगत् के लिए आश्चर्यकारी है और धर्मी तो उसमें भी चैतन्यतत्त्व की महिमा को ही देखता है। जहाँ तीर्थङ्कर का जन्म होनेवाला होता है, वहाँ 15 महीने तक प्रतिदिन करोड़ों अद्भुत रत्नों की वृष्टि होती है। यहाँ आत्मा, परमात्मा होने लगा, वहाँ परमाणु भी पलटकर रत्नोंरूप परिणमन करने लगे। देखो तो सही... धर्म के साथ के सत्पुण्योदय का अचिन्त्य प्रभाव!

हे देव! लोक में तेजस्वी माने जानेवाले सूर्य-चन्द्रमा भी आपके मुखमण्डल की प्रभा के सामने तो फीके लगते हैं; इसी प्रकार अतीन्द्रिय चैतन्यभाव के सामने इन्द्रियभाव, चेतनाहीन लगते हैं – इस प्रकार भगवान को देखकर भव्यजीव भेदज्ञान करते हैं।

हे देव! चन्द्रमा के उदय से तो (सूर्यमुखी) कमल संकुचित हो जाता है, जबकि आपके मुखचन्द्र के दर्शन से तो भव्यकमल खिल उठते हैं। चन्द्रमा तो सोलह कलाओं से खिलने के बाद फिर संकुचित होने लगता है, जबकि आपको जो पूर्ण केवलज्ञानरूपी कला खिली है, वह कभी संकुचित नहीं होती और आपकी भक्ति से हमें साधकभावरूप जो सम्यग्ज्ञानकला खिली है, वह अब संकुचित नहीं होगी; वृद्धिङ्गत होकर पूर्ण होगी और आपके जैसा परमात्मपद प्राप्त करेगी।