भक्तामर स्तोत्र काव्य
।। भक्तामर स्तोत्र काव्य 31-32 ।।

काव्य : 31

छत्रत्रयं तव विभाति शशाङ्ककान्तम्
मुच्चैः स्थितं स्थगितभानुकर-प्रतापम्।
मुक्ताफलप्रकरजालविवृद्ध-शोभं,
प्रख्यापयत्रिजगतः परमेश्वरत्वम्॥३१॥

चन्द्र-प्रभा सम झल्लरियों से, मणिमुक्तामय अति कमनीय।
दीप्तिमान् शोभित होते हैं, सिर पर छत्रत्रय भवदीय॥
ऊपर रहकर सूर्य-रश्मि का, रोक रहे हैं प्रखर-प्रताप।
मानो वे घोषित करते हैं, त्रिभुवन के परमेश्वर आप॥३१॥

काव्य : 31 पर प्रवचन

हे देव! जिसकी झालर में चन्द्रमा की चाँदनी जैसे मोती चमक रहे हैं – ऐसे अत्यन्त सुशोभित तीन छत्र, आपके तीन जगत् के परमेश्वरपने को प्रसिद्ध कर रहे हैं और सूर्य की किरणों के प्रताप को रोक रहे हैं।

अहो देव! आपके ऊपर झूलते अतिसुन्दर तीन छत्र यह सूचित करते हैं कि रत्नत्रय से इन भगवान ने तीन लोक का परमेश्वरपना प्रगट किया है। प्रभु के समक्ष चन्द्रमा भी हार गया, क्योंकि 'प्रभु का परमशान्त आत्मतेज तीन लोक को प्रकाशित करता है और भव के आताप को हरता है - फिर मेरा क्या काम!' इस प्रकार अपने अधिकार का हनन हो जाने से पराजित वह चन्द्रमा स्वयं तीन छत्र का रूप धारण करके प्रभु की सेवा कर रहा है - ऐसा हमें लगता है।

चन्द्रमा को शान्त गिना जाता है, परन्तु हे देव! आपकी परम शान्त-शान्त मुद्रा के समक्ष पराजित होकर वह चन्द्रज्योतिष इन्द्र, तीन छत्र का रूप धारण करके आपकी सेवा कर रहा है। वाह! तीन छत्र द्वारा भी कैसा अलङ्कार करके प्रभु का गुणगान किया है !!

प्रभो! इस छत्र द्वारा सूर्य का प्रताप रुक गया है; रत्नत्रय से आपने जहाँ भव का आताप दूर किया, वहाँ बाहर में सूर्य का आताप कैसा? जैसे, आपकी छत्रछाया में सूर्य के आताप का प्रवेश नहीं है; वैसे ही जिसने आपकी छत्रछाया का स्वीकार किया है, उस आत्मा में भवताप का प्रवेश नहीं होता।

अहा! आश्चर्य है कि आपके ऊपर जो तीन दिव्य छत्र हैं, वे सङ्कल से कहीं टाँगे नहीं हैं, किसी ने छतरी की भाँति पकड़ा नहीं है, वे तो बिना आधार के आकाश में ऐसे ही लटके हुए हैं। जैसे, मोक्षमार्ग में आपके शुद्धरत्नत्रय को बाहर में कोई आलम्बन नहीं है; वैसे ही आपके तीन छत्र भी किसी के आलम्बन बिना निरालम्बीरूप से आकाश में झूल रहे हैं। ऐसी अद्भुत शोभा आपके अतिरिक्त अन्य किसे होगी। यही आपका तीन लोक में श्रेष्ठपना प्रसिद्ध करता है।

उस छत्र में जो मोती चमकते हैं, वे ऐसे लगते हैं कि मानो चन्द्रमा के साथ तारे और नक्षत्र-ग्रह आकर आपकी सेवा कर रहे हों। ज्योतिषी देवों के इन्द्र, सूर्य-चन्द्रमा भी जिनेन्द्रदेव के सेवक हैं। प्रभु की तीन लोक में कौन सेवा नहीं करता? प्रभु के रत्नत्रय-छत्र की छाया, तीन जगत् के जीवों को शान्ति प्रदान करनेवाली और कषाय के ताप से बचानेवाली है।

प्रभो! हमारे ऊपर शोभायमान आपकी छत्रछाया हमारे भवताप को दूर करनेवाली है। इस प्रकार तीन छत्र द्वारा अलङ्कारिक प्रकार से भगवान की महिमा करके स्तुति की गयी है।

इस प्रकार भगवान के चौथे प्रातिहार्य का वर्णन किया।

काव्य : 32

गम्भीर-ताररव-पूरित-दिग्विभाग –
स्त्रैलोक्य-लोकशुभसङ्गमभूतिदक्षः।
सद्धर्मराज-जय घोषण-घोषकः सन्
खे दुन्दुभिर्ध्वनति ते यशसः प्रवादी॥ ३२॥

ऊँचे स्वर से करनेवाली, सर्व दिशाओं में गुञ्जन।
करनेवाली तीन लोक के, जन-जन का शुभ सम्मेलन॥
पीट रही हैं डंका – “हो सत् धर्मराज की ही जय-जय"।
इस प्रकार बज रही गगन में, भेरी तव यश की अक्षय॥३२॥

काव्य : 32 पर प्रवचन

तीर्थङ्कर प्रभु के अतिशयरूप आठ प्रातिहार्यों में देव दुन्दुभि, पाँचवां प्रातिहार्य है। देवों के ये दिव्य वाद्ययन्त्र अत्यन्त गम्भीर मधुर और स्पष्ट आवाज से दसों दिशाओं में घोषणा करते हैं कि हे तीन लोक के जीवों! धर्मराजा सर्वज्ञ परमेश्वर यहाँ विराजमान हैं, उनके दर्शन करने यहाँ आओ, उनका सत्सङ्ग करने आओ; अन्य लाखों काम छोडकर आत्मा का अचिन्त्य वैभव लेने इन प्रभु के पास आओ।

अहा! समवसरण के इन दिव्य नगाड़ों के नाद अभी यहाँ सुनाई देते हैं – ऐसे भाव से स्तुतिकार कहते हैं कि अहो देव! यह दुन्दुभी का नाद सत्यधर्म का तथा धर्मसाम्राज्य के नायक - ऐसे आपकी जय-जयकार कर रहे हैं और आपका यशगान सुना रहे हैं। भव्यजीवों को ऐसी पुकार कर रहे हैं कि हे जीवो! धर्म प्राप्त करने के लिए यहाँ आओ और मोक्ष के साक्षीदार इन भगवान की सेवा करो। धर्म की प्राप्ति का उत्तम अवसर मिला है, इसलिए प्रभु के धर्मदरबार में धर्म का श्रवण करने आओ।

• भगवान के समवसरण में देव एकसाथ साढ़े बारह करोड़ वादित्र बजाते हैं, इसमें घरघराहट नहीं होती परन्तु अत्यन्त मधुरता होती है। उन वाद्ययन्त्रों की सुमधुर आवाज के उपरान्त प्रभु को देव दुन्दुभी का एक अतिशय होता है।

भगवान के आठ प्रातिहार्य होते हैं, उनका वर्णन इस भक्तामर स्तोत्र में 28 से 35 तक आठ श्लोक में है। जिसमें, श्वेताम्बर मान्य भक्तामर स्तोत्र में शुरु के चार लिये हैं और शेष चार - दुन्दुभी, पुष्पवृष्टि, भामण्डल और दिव्यध्वनि (श्लोक 32 से 35) उनमें नहीं है। दिगम्बर-मान्य मूल भक्तामर स्तोत्र में 48 श्लोक की रचना है। कदाचित् प्रति लेखक की असावधानी से भी वे चार श्लोक छूट गये हो सकते है।

समवशरण में दुन्दुभी के दिव्य नाद के बीच देव, प्रभु का जय-जयकार करके प्रसिद्ध करते हैं कि धर्म के राजा यहाँ विराजमान है, आत्मा का परमात्मवैभव बतानेवाले परमात्मा यहाँ विराजते हैं। हे जीवो ! सत्धर्म प्राप्त करने के लिए यहाँ आओ.... मोक्ष का मार्ग यहाँ खुला है –

जीवों! प्रमाद तज दो, भज ईश को लो।
है मार्ग-दर्शक, यहाँ बस पास आजो।
ये बात तीन जगको बतला रहा है,
आकाश बीच सुर-दुन्दुभि-नाद तेरा॥

(- कल्याणमन्दिर स्तोत्र - 25 )

मानतुङ्ग स्वामी रचित भक्तामर स्तोत्र और कुमुदचन्द्र रचित कल्याण मन्दिर स्तोत्र, इन दोनों में बहुत समानता है।

अहा! समवसरण तो तीर्थङ्कर प्रभु का धर्मदरबार है, वहाँ आनेवाले जीव महाभाग्यवन्त हैं; प्रभु की वाणी, उन्हें आत्मा का परम वैभव सुनाकर मोक्ष का मार्ग दिखाती है। ऐसे समवसरण में विराजमान धर्मराजा की यह स्तुति चल रही है। उसमें देवदुन्दुभी के वर्णन द्वारा प्रभु की स्तुति की गयी है।

(इस प्रकार प्रभु के आठ में से पाँचवें देव-दुन्दुभी -प्रातिहार्य का वर्णन किया।)