भक्तामर स्तोत्र काव्य
।। भक्तामर स्तोत्र काव्य 19-20 ।।

काव्य : 19

किं शर्वरीषु शशिनाऽह्नि विवस्वता वा?
युष्मन्मुखेन्दु-दलितेषु तमस्सु नाथ!
निष्पन्न-शालिवनशालिनि जीव-लोके,
कार्य कियज्जल धरै जल-भार-ननैः॥१९॥

नाथ आपका मुख जब करता, अन्धकार का सत्यानाश।
तब दिन में रवि और रात्रि में, चन्द्र-बिम्ब का विफल प्रयास॥
धान्य-खेत जब धरती तल के पके हुए हों अति अभिराम।
शोर मचाते जल को लादे, हुए घनों से तब क्या काम॥१९॥

काव्य : 19 पर प्रवचन

हे परमदेव! जहाँ आप विराजमान हो, उस धर्मदरबार में (समवसरण में) आपके दिव्य मुख की ऐसी प्रभा फैल जाती है कि रात-दिन का भेद नहीं रहता। इस प्रकार आपके मुख की प्रभा से ही जहाँ अन्धकार दूर हो जाता है तो फिर वहाँ रात्रि के चन्द्रमा या दिन के सूर्य का क्या काम है? जिस खेत में चावल आदि अनाज पक गया है, वहाँ अब जलसहित बादलों का क्या काम है?

हे देव! आपके अतीन्द्रिय ज्ञानतेज के सामने इन्द्रियज्ञान तो एकदम फीका पड़ गया है। जहाँ अतीन्द्रियज्ञान विकसित हो गया, वहाँ इन्द्रियों का क्या काम है ? स्वानुभूति में साधक का ज्ञान भी इन्द्रियों से पार रहकर काम करता है। तीर्थङ्कर प्रभु की मुद्रा का तेज भी ऐसा अद्भुत होता है कि सूर्य-चन्द्रमा का तेज भी उसके सामने आच्छादित हो जाता है।

भगवान ऋषभदेव के जन्म से पहले इस भरतक्षेत्र में (तीसरे काल में) भोगभूमि थी और कल्पवृक्ष थे, उन कल्पवृक्षों में ऐसा तेज था कि उसके सामने सूर्य-चन्द्रमा दिखायी नहीं देते थे; फिर जब कल्पवृक्ष का तेज फीका पड़ने लगा, तब सूर्य-चन्द्रमा दिखायी देने लगे। पहली बार उन्हें देखकर भोले जीव कहने लगे - अरे, आकाश में दो तेजस्वी गोले किसके हैं? कहाँ से आये हैं? तब कुलकर ने समझाया कि ये तो सूर्य और चन्द्रमा हैं। अब, कल्पवृक्ष तेज नहीं देंगे, तब ये सूर्य और चन्द्रमा देंगे, इसलिए इनसे डरना नहीं।

यहाँ तो भक्त कहता है कि हे भगवान! जहाँ हमें ज्ञानप्रकाश देनेवाले आप विराजमान हो, वहाँ हमें सूर्य-चन्द्रमा का तेज भी फीका लगता है। सूर्य-चन्द्रमा का प्रकाश तो इन्द्रियज्ञान में निमित्त है और आप तो अतीन्द्रियज्ञान का प्रकाश देनेवाले हो। आपके शरीर का तेज भी कोई अलौकिक, आश्चर्यकारी है और अन्दर आत्मा का चैतन्यतेज भी अचिन्त्य आश्चर्यकारी है।

जैसे, खेत में भरपूर अनाज पक जाने के बाद वर्षा की क्या आवश्यकता है? उसी प्रकार जहाँ आप विराजमान हो, वहाँ प्रकाश ही है तो फिर सूर्य-चन्द्रमा की क्या आवश्यकता है? और आत्मा में अतीन्द्रियज्ञान विकसित हुआ, तब इन्द्रियों की अथवा उनके निमित्तरूप सूर्य-चन्द्रमा के प्रकाश की क्या आवश्यकता है? जहाँ ज्ञान-तेज खिल गया, वहाँ अब प्रकाश, इन्द्रियों आदि की पराधीनता नहीं रहती। इसकी अद्भुत महिमा प्रवचनसार में कुन्दकुन्द आचार्यदेव ने समझायी है। प्रवचनसार गाथा-67 में वे कहते हैं कि यदि अन्धकार में दिख जाए - ऐसी आँख की शक्ति हो तो (बिल्ली आदि को) दीपक की क्या आवश्यकता है? वैसे ही आत्मा स्वयं स्वभाव से सुखरूप परिणमित हुआ है तो विषय उसमें क्या करते हैं? हे देव। आपका ज्ञान और सुख, दोनों बाह्य-विषयों से निरपेक्ष हैं, स्वाधीन-स्वयंभू हैं।

प्रभो! आपकी प्राप्ति होते ही हमारे आत्मा में ज्ञानप्रकाश हुआ, अज्ञानरूपी अन्धकार दूर हो गया, उसके लिए अब, सूर्य -चन्द्र की कोई आवश्यकता नहीं है। चैतन्य के अतीन्द्रिय सुख के सामने अब बाह्य विषयों की आवश्यकता नहीं है। आपके शासन को प्राप्त करके हमारे चैतन्यरूपी खेत में धर्म का अनाज पका है, वहाँ अब जगत् में अन्य किन्हीं देवों से हमें क्या काम है ? अरे, धर्म का बगीचा, गुणों से विकसित हुआ, उसमें पुण्य की या राग की भी अपेक्षा कहाँ है? चैतन्य के अन्तर में से धर्म का परिणमन हुआ, उसमें बाह्य साधन का कोई प्रयोजन नहीं है।

प्रभो! आपके सन्मुख देखते ही मोहरूपी अन्धकार दूर हो जाता है और सब संशय मिट जाता है। यदि आप सर्वज्ञदेव हमें मिले तो अब बाहर में अन्य किसी का प्रयोजन नहीं है। ऐसे भक्तिभावपूर्वक धर्मीजीव, अपनी परिणति को परभावों से पराङ्मुख करके अन्तर्मुख हो जाता है... यह स्तुति का तात्पर्य हैं।

आप समान न अन्य कोई हे प्रभो! इस जगत में आपके समान अन्य कोई देव नहीं है। इस प्रकार पहिचानपूर्वक मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

हे भगवान! आपको सम्पूर्ण इच्छाओं का अभाव हो गया होने से आप 'निर्ग्रन्थ' हैं।

- विषापहार प्रवचन, पृष्ठ-37


काव्य : 20

ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं,
नैवं तथा हरिहरादिषु नायकेषु।
तेजः स्फुरन्माणिषु याति यथा महत्त्वं,
नैवं तु काचशकले किरणाकुलेऽपि॥२०॥

जैसा शोभित होता प्रभु का, स्व-पर प्रकाशक उत्तम ज्ञान।
हरिहरादि देवों में वैसा, कभी नहीं हो सकता भान॥
अति ज्योतिर्मय महारतन का जो महत्त्व देखा जाता।
क्या वह किरणाकुलित कांच में, अरे कभी लेखा जाता॥२०॥

काव्य : 20 पर प्रवचन

भगवान के अतीन्द्रिय ज्ञानप्रकाश की महिमा करते हुए साधक कहता है कि हे देव! अनन्त भावों से परिपूर्ण आपके केवलज्ञान में जैसी शोभा है, वैसी शोभा लोक के अन्य देव -ब्रह्मा-विष्ण-महेश-शंकर आदि में नहीं है। उनका ज्ञान तो इन्द्रियों के आधीन तथा क्रोधादि कषायों से मलिन है। चमकदार मणिरत्न का जैसा महान तेज है, वैसा तेज काँच के टुकड़े में नहीं होता, – भले ही वह सूर्य की किरणों से चमकता हो! (वह चमक उसकी नहीं है, वह तो बाहर की किरणों से हुई है।)

कहाँ जगमगाता मणि और कहाँ काँच का टुकड़ा ! उसी प्रकार हे देव! आपके अतीन्द्रियज्ञान के सामने अन्य कुदेव तो हमें काँच के टुकड़े जैसे लगते हैं – भले ही कभी उनके पुण्य की थोड़ी चमक दिखायी देती हो और कई व्यन्तर आदि देव उन्हें पूजते हों परन्तु तीन लोक के इन्द्र, जिन्हें पूजते हैं - ऐसा महान केवलज्ञान तो आप में ही सुशोभित है। आपके जैसी पवित्रता या आपके जैसा पुण्य दूसरों को नहीं होता।

प्रभो! अज्ञानदशा में कोई खबर नहीं थी, तब तो काँच के टुकड़े जैसे रागी-द्वेषी कुदेवों को मैंने पूजा, परन्तु अब तीन लोक में तेज फैलानेवाले आप सर्वज्ञमणि मुझे मिले, मैने आपको पहचाना; अब आपको छोड़कर अन्य कहीं मेरा मन मोहित नहीं होता। अन्य रागी जीवों को भले ही जगत् में करोड़ों जीव पूजते हों, परन्तु हमारे चित्त में तो वीतराग – ऐसे आप ही बसे हो। जैसे सच्ची मणि किसी-किसी को ही मिलती है, काँच के टुकड़े तो चारों तरफ पड़े होते हैं; उसी प्रकार कुदेव को माननेवाले करोड़ों जीव होते हैं, परन्तु सर्वज्ञ वीतरागदेव को पहचाननेवाले जीव तो अति विरले ही होते हैं।

प्रभो! आपके जैसा ज्ञान और आपके जैसी वीतरागता, जगत् में अन्यत्र कहीं नहीं है। अतीन्द्रिय स्वसंवेदन ज्ञान में हमें चैतन्यमणि दिखायी पड़ी, उसके चैतन्य तेज के सामने पुण्य तो काँच के टुकड़े-सा लगता है, वह हमारे चित्त को आकर्षित नहीं कर सकता।

देखो, ज्ञान और राग के बीच का साधक जीवों का विवेक! सुदेव और कुदेव के अन्तर की परीक्षा !! हीरे का अपरीक्षक अनजान मनुष्य तो चमकते हुए काँच के टुकड़े को हीरा मान लेता है, परन्तु कुशल परीक्षक काँच और हीरे के बीच का भेद तुरन्त परख लेता है; वैसे ही देव की परीक्षा नहीं जाननेवाले अज्ञानीजन तो किसी भी पुण्यवन्त या व्यन्तरादि देव को भगवान मान लेते हैं, परन्तु कुशल मुमुक्षु तो वीतराग-सुदेव और सराग -कुदेव के बीच का भेद परख लेता है।

आत्मा की शोभा और पूज्यता राग से नहीं, अपितु सर्वज्ञता और वीतरागता से आत्मा की शोभा है। जिसे राग-द्वेष होता हो, जो क्रोध से राक्षसों का या दुश्मनों का संहार करता हो, जिसे स्त्री का साथ हो, मुकुट-वस्त्र-आभूषण आदि शृंगार हो - ऐसे जीव, लोक में भले कितने ही बड़े गिने जाते हों परन्तु जैनधर्म में वे देव के समान शोभित नहीं होते। भगवान का भक्त ऐसे किसी कुदेव को नहीं मानता। जैनधर्म में तो जो सर्वज्ञ और वीतराग होते हैं, वे ही देव सुशोभित होते हैं। प्रभो! पुण्य से नहीं, अपितु सर्वज्ञता से आप हमारे पूज्य और इष्ट हो।

सर्वज्ञ परमात्मा का भक्त, पञ्च परमेष्ठी के अतिरिक्त अन्य किसी देव-देवी को नहीं मानता, नहीं पूजता। जो परमात्मा का भक्त हुआ, उसे अब जगत् का भय नहीं है, उसे कुदेव-देवी का भय नहीं होता। चैतन्यमणि अर्थात् मेरे सर्वज्ञप्रभु के सामने तो सब काँच के टुकड़े जैसे हैं - ऐसा समझकर, वह सर्वज्ञ प्रभु के वीतरागमार्ग के अतिरिक्त अन्य किसी कुमार्ग में नहीं झुकता है। नि:शंकरूप से वीतरागमार्ग में चलता है - इसका नाम भगवान की भक्ति है।

इस प्रकार सर्वज्ञता के महान आदरपूर्वक भगवान की स्तुति की गयी है।

मुक्तदशा प्राप्ति की विधि निश्चय से देखा जाए तो ये सभी नाम भगवान चैतन्यधातु के हैं। ध्रुव चिदानन्द आत्मा ज्ञान-आनन्दादि अनन्त-अनन्त गुणों की खान है। यह वास्तव में चिन्तामणि, कल्पवृक्ष, कामधेनु, कामकुम्भ, सिद्धरस, महामन्त्रादि सबकुछ है। ये सब वास्तव में आत्मा को ही लागू पड़ता है। ऐसी पहिचान जिसे होती है, उसके संसार का अल्पकाल में ही अभाव हो जाता है और उसे मुक्तावस्था की प्राप्ति होती है।

-विषापहार प्रवचन, पृष्ठ-53