।। भगवान् अपूर्व दीपक ।।
आचार्य मानतुंग कृत भक्तामर स्तोत्र
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निर्धूम-वर्तिरपवर्जित-तैल-पूरः,
कृत्स्नं जगत्त्रयमिदं प्रकटीकरोषि।
गम्यो न जातु मरूतां चलिताचलानां,
दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ! जगत्प्रकाशः।।16।।
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अन्वयार्थ-(नाथ!) हे स्वामिन्! आप (निर्धूमवर्तिः) धुआं और बत्ती से रहित निर्दोष प्रवृत्ति वाले और (यअपवर्जित तैलपूरः) तैल से रहित (भूत्वा अपि) होकर भी (इदम्) इस (कृत्स्नम्) सम्पूर्ण (जगत्त्रयम्) तीन लोक को (प्रकटीकरोषि) प्रकाशित करते हो तथा (चलिताचलानाम्) पहाड़ों को हिला देने वाली (मरूताम्) वायु के भी (जातु) कभी (गम्यः न) गम्य नहीं हो। (वायु बुझा नहीं सकती) (त्वम्) आप (जगत्प्रकाशः) संसार को प्रकाशित करने वाले (अपरः दीपः) अपूर्व दीपक (असि) हो।

भावार्थ-हे नाथ! आप तीन जगत् को प्रकाशित करने वाले अद्भुत अनुपम दीप हो। धूम, बत्ती, तैल से रहित होकर भी समस्त लोक को प्रकाशित करते हो। भयंकर वायु के झोकों के भी आप गम्य नहीं हो अर्थात वायु से कभी बुझते नहीं हो। इस प्रकार आप संसार को प्रकाशित करने वाले अपूर्व दीपक हो।

प्रश्न - 1अपूर्व दीपक किसे कहते हैं?

उत्तर- जो धूम रहित, बत्ती रहित और घी रहित हो फिर प्रकाशमान हो, जिसे कोई बुझा नहीं सकता तथा जो तीन लोक को प्रकाशित करता है उसे अपूर्व दीपक कहते हैं।

प्रश्न - 2भगवान् अपूर्व दीपक क्यों है? तुलना कीजिये?

उत्तर- 1. अन्य दीपकों की बत्ती से धुंआ निकलता रहता है पर आपकी वर्ति मार्ग निर्धूम-पाप रहित है।
2. अन्य दीपक तैल की सहायता से प्रकाशित होते हैं आप बिना किसी की सहायता से ज्ञान प्रकाश फैलाते है।
3. अन्य दीपक हवा से नष्ट हो जाते हैं पर जिनेन्द्र प्रभु का केवलज्ञान दीप सदा प्रकाशित रहता है।
4. अन्य दीपक थोड़े से स्थान को प्रकाशित करता है पर आप समस्त लोक को प्रकाशित करते हैं।